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हमारा काम भाषा की मानवीयता को बचाना, इसकी बड़ी जरूरत

सम्मान….

दिल्ली।

पुरस्कार लेना अच्छा है, पुरस्कार लेकर जल्दी भूल जाना और अच्छा है। हिंदी में पुरस्कार मिलने पर पाठक बढ़े, ना बढ़े, शत्रु जरूर बढ़ जाते हैं। आज हमारी बेचैनी टुच्ची चीजों को लेकर हो गई है। एक दौर था जब लोग प्रधानमंत्री की आलोचना कर सकते थे। आज तो पूरा भारत ही मुदित होकर देखता है। साहित्य का काम आपके इस अमन-चैन में कुछ अकुंश लगाता है, अड़चन डालता है। ऐसी बेचैनी पैदा करने का काम इन दोनों लेखकों ने अपने-अपने ढंग से किया है। हमें अपने भाषा के इस विद्रूप के प्रति सजग होना है, हमारा काम भाषा की मानवीयता को बचाना है। आज इसकी बड़ी जरूरत है।
यह बात प्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में कही। अवसर रहा केरल के हिन्दी साहित्यकार ए. अरविंदाक्षन और अरुणाचल प्रदेश से कवियित्री जमुना बीनी को ‘तथागत साहित्य सम्मान’ से सम्मानित करने का। आरंभ सरस्वती वंदना से हुआ। तथागत ट्रस्ट के संरक्षक डॉ. एन.पी. सिंह (पूर्व आईएएस) ने ए. अरविंदावन और जमुना बीनी सहित सभी गणमान्य अतिथियों का अभिनन्दन किया। भारतीय शिक्षा बोर्ड की हिन्दी पाठ्य पुस्तकों की समिति के अध्यक्ष और हाल ही में दिवंगत प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार रामदरश मिश्र की स्मृति में आयोजित इस समारोह में विख्यात साहित्यकार सुत्री अनामिका ने कहा कि ट्रस्ट ने सुदुर केरल से साहित्यकार को सम्मान के लिए चुना, जिससे लगता है कि स्वयं बुद्ध ने संवाद और सम्मान के लिए शंकराचार्य को अपने पास बुला लिया हो। उन्होंने ‘कामायनी’ से साहित्यकार रामदरश मिश्र को याद किया। सम्मानितों पर ओम निश्चल व संस्कृतिकर्मी विशाल पांडेय ने भी विचार व्यक्त किए। डॉ. सोनी पाण्डेय द्वारा दोनों साहित्यकारों का परिचय दिया गया। उपस्थित अतिथियों ने शॉल, प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न एवं १ लाख १ हजार की सम्मान द्वारा उन्हें सम्मानित किया। ए. अरविंदाक्षन ने सम्मान के लिए आभार व्यक्त किया।
वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री चंद्रकांता ने अध्यक्षीय वक्तव्य में रामदरश जी की स्मृति को याद किया और सम्मानित रचनाकारों को बधाई देते हुए कहा कि अनुवाद और उसकी संस्कृति परस्पर होनी चाहिए। यदि तमिल से हिंदी में अनुवाद हो रहा है तो हिंदी से भी तमिल में अनुवाद होना चाहिए।

आयोजन का संचालन हिन्दी लेखिका डॉ. सोनी पाण्डेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. स्मिता मिश्र ने अपने पिता व साहित्यकार रामदरश मिश्र की एक कविता का अंश सुनाया।