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हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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गणतंत्र:संविधान से आम आदमी तक (२६ जनवरी विशेष)…

आज हमारा देश स्वतंत्र है,
पर क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?
कहने को आज लोकतंत्र है,
पर क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

मेरे ख्याल से तो नहीं, बिलकुल नहीं,
हम आज भी परतंत्र हैं
भले ही अंग्रेजों से मुक्ति मिल गई,
हम आज भी नहीं स्वतंत्र हैं
हम आज गुलाम हैं खुद अपनों से,
हम गुलाम हैं चली आ रही सोच से।

हम गुलाम हैं- लोग क्या कहेंगे,
कुछ गुलाम हैं विवशता से
हम सब गुलाम हैं दकियानूसी विचार से,
कहने को तो संविधान की नजरों में
सभी लोग बराबर हैं
लेकिन आज भी बहन-बेटी सुरक्षित नहीं,
ना घर के अंदर
अपने परिवार और समाज के विचारों से,
और न घर के बाहर कुछ हैवानों से।

हमें खुद को बदलना होगा,
हमें नई सोच में ढलना होगा
बेटा-बेटी में भेद नहीं है,
जैसे बेटे की माँ, वैसे बहू की माँ
जैसे अपनी माँ, वैसे अपनी सासू माँ,
जैसे मेरी बहन, वैसे मेरी ननद
जैसे मेरे पिता, वैसे मेरे ससुर,
जैसे मेरा भाई, वैसे मेरा देवर और जेठ
फ़िर दोनों परिवार हैं एक,
सभी ये विचार रखें नेक
फिर देखें समाज की नयी भेंट।

सभी के लिए विचार समान,
तभी पाएं जीवन में सम्मान
जाति-पाति का भेद नहीं,
दहेज प्रथा तब मिटे सभी
धर्म के नाम पर कोई बंटे नहीं,
और इंसानियत घटे नहीं।
तब शायद हम कह सकेंगे,
हाँ! अब हम स्वतंत्र हैं॥