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हवा भी छूने लगी नदी का बदन

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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हवा भी हौले से छूने लगी नदी का बदन,
लहरों में भी होने लगी हलचल

जैसे मेरे दिल ने महसूस की सूरज की पहली किरण,
नदी में हलचल उठने लगी सजीव सी।

उसका हृदय झंकृत हुआ, हुआ अजीब-सा,
ऐसी मचली कि मदमस्त हो गई पागल-सी

उसकी धाराएँ कभी लातीं मुस्कान, हँसने-सी,
नदी यह चली हवाओं के साथ
अब कुछ भी हो, नहीं छोड़ती उसका हाथ
दोनों ने कसम खाई है साथ-साथ,
नदी के सीने में मर्मस्पर्श हुआ एकसाथ।

यह एक स्पर्श नहीं, प्रकृति का मिलन है,
यह देख ब्रह्मांड भी खिलखिलाने लगा
सारी सृष्टि जल-वाष्प के साथ मुस्कुराने लगी,
इस मिलन पर बादल ने मेघ बरसाए
पक्षियों ने कलरव ध्वनि से गुणगान किया।

मधुर मिलन की यह बेला अजब आई,
प्रकृति ने भी साज-सज्जा से श्रृंगार किया 
अब याद रखा जाएगा यह मिलन-
कैसे छुआ हवा ने हौले से नदी का बदन।
कैसे खिली नदी का अंतरंग,
कैसे हुआ दोनों के प्यार का संगम॥