आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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मेरे भाग्य विधाता (शिक्षक दिवस विशेष)…
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु है, गुरु ही साक्षात शिव,
गुरु बिन उपजे न ज्ञान, गुरु बिन जीवन निर्जीव
गुरु शिष्य की परंपरा उस युग काल रहे सजीव,
प्राणियों में सद्भावना ज्ञानी थे, जन्तु और जीव।
वैदिक काल की बेला, गुरुकुल थे दिव्य विधाता,
उपनयन हो बालक, बारह वर्ष तक तप था पाता
श्रुति परंपरा ज्ञान बढ़ाता, आचरण से गुरु कृपा पाता,
गुरु वशिष्ठ से राम, गुरु संदीपनि से कृष्ण को ज्ञान बरसता।
अठारह सौ पैंतीस में मैकाले ने बदला शिक्षा चक्र,
श्रद्धा मिटा, अनुबंध टिका, डिग्री पैसों का खेल कुचक्र
‘गुरु’ आश्रम से निकले, शिक्षक कर्मचारी बने समग्र,
शुल्क, समय, पाठ्यक्रम का बंधन सब शिक्षा सौदा को व्यग्र।
शिक्षक देते हैं सूचना, गुरु ज्ञान मे मिश्रित बोध,
शिक्षक राह दिखाते हमें, गुरू ही जीवन शोध
गुरु शिष्य को ‘शिव’ बनाते, हों कितने अवरोध,
शिक्षक एक प्रहर हमारे, गुरु जीवन के तोड़ें प्रतिरोध।
अठारह सौ अठासी, पांच सितंबर अद्भुत दिन था आया,
तिरुत्तनी में अवतरित बालक ‘राधा कृष्णन’ कहलाया
ऑक्सफोर्ड प्राध्यापक को भारत ने राष्ट्रपति बनाया,
भारत रत्न सुशोभित, दर्शन शास्त्र के विद्वान-सी काया।
उन्नीस सौ बासठ में शिष्य आये जन्मदिन मनाने,
राष्ट्रपति राधा कृष्णन गुरु बोले, शिक्षक दिवस ही जानें।
शिक्षक का सम्मान बढ़े, सब शिक्षक को पहचानें,
५ सितंबर शिक्षक दिवस को हर्ष स्वरूप में मानें॥
परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”