पटना (बिहार)।
१९४२ के अग्र पांक्तेय नायकों में से एक पं. बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ केवल एक बलिदानी स्वतंत्रता सेनानी और आदर्श राजनेता ही नहीं, अपितु स्तुत्य साहित्यकार भी थे। वे १९५७ तक विधानसभा के सदस्य रहे, किंतु पटना या देवघर में एक घर तक नहीं बना सके। राजनीति उनके लिए सत्ता-सुख की नहीं, सेवा और आत्म-सुख की साधन रही। कैरव जी की साहित्यिक और कार्य नैपुण्य प्रतिभा बहुमुखी थी। उनकी समाज सेवा, राष्ट्रसेवा और साहित्य-सेवा के साथ राजनैतिक दिशा भी मानवतावादी और संवेदना प्रधान रहीं।
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह एवं कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने यह बातें कही। आपने बताया कि सम्मेलन के प्रचार मंत्री के रूप में उन्होंने तत्कालीन बिहार के सभी जिलों में जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलनों को सक्रिय और सार्थक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वे सम्मेलन के एकादशवें अधिवेशन के अवसर पर तत्कालीन संथाल परगना में हिन्दी-प्रचारार्थ गठित उपसमिति के संयोजक बनाए गए थे।
