पटना (बिहार)।
आज की लघुकथा व कहानियों की गोष्ठी सार्थक रही। कहानियाँ पहले वाचिक परंपरा में थीं। प्राचीन काल से हम कहानियाँ सुनते आए हैं। बीच में लिखित परम्परा का दौर आया। अब पुनः लिखित के साथ वाचिक का युग लौट आया है। कहानियाँ लिखी भी जा रही हैं और पढ़ी-सुनी भी जा रही हैं। मनीषा सहाय की कहानी भी आम जन की कथा को संपूर्ण संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करती है। लघुकथाकारों को दोषों से बचना चाहिए, और इसके लिए भरपूर अध्ययन आवश्यक है।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में आयोजित लघुकथा सम्मेलन में यह बात अध्यक्षीय उदबोधन में वरिष्ठ लेखिका अनिता रश्मि ने कही।
इस अवसर पर संयोजक सिद्धेश्वर ने कहा कि लघुकथा भले लघु हो, किंतु उसके सृजन के बाद लेखक को इसे बार-बार पढ़कर देखना चाहिए कि कहीं वह कालदोष से ग्रस्त तो नहीं ? इसकी पंचलाइन प्रभावी है या नहीं ? एक श्रेष्ठ लघुकथा के कई मानक होते हैं। केवल आकार में छोटा होना श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। श्रेष्ठ सृजन के लिए अध्ययन की जरूरत है, विश्वविद्यालय जाने की नहीं। इस सम्मेलन में सिद्धेश्वर ने मुख्य अतिथि जयंत तथा मनीषा सहाय से संक्षिप्त संवाद किया।
अनिता रश्मि ने बताया कि जयंत जी की कहानी का शीर्षक ‘अर्थात द्वार’ कथा के प्रति उत्सुकता जगाता है।
जयंत और मनीषा ने भी अपनी भावना व्यक्त की।
