ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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ज़िंदगी एक वसंत (वसंत पंचमी विशेष)…
हे!वाग्देवी ज्ञानदा, सुन लो मेरी प्रार्थना,
हम पर तुम कृपा करो, दूर करो दुर्भावना।
तेरी शरण में आयी हूँ, दो फूल चढ़ाने लाई हूँ,
दे दो ! वाग्देवी ज्ञानदा, सुन लो मेरी प्रार्थना।
मन के सारे दर्प दूर हों, दिल के सारे भ्रम दूर हों,
ऐसा कुछ मैं कर जाऊँ, जग में नाम कर जाऊँ।
हे !वीणापाणी ज्ञानदायिनी, सुखकारिणी दुखहारिणी,
हम पर इक नजर डालो, हे सबकी दुखनिवारिणी।
मूर्खों को भी ज्ञान दिया, कितनों को ही तार दिया,
भटके को भी राह दिखायी, माता तू विद्या दायिनी।
मंद-मंद मुस्कान तेरी, दिल को बड़ी लुभावनी,
तेरे चेहरे पर है तेज बड़ा, माता मेरी हंसवाहिनी।
हे !वाग्देवी शारदा, सुन लो मेरी विनम्र निवेदना,
सभी एक-दूसरे से प्यार करें, खाली न जाए याचना।
जिसका कोई नहीं, उसकी भी तू माँ बन जाती है,
अद्वैत को भी तूने तारा, अपनी ममता दिखलाती है।
कही जाती तू ब्राम्ही भारती, ज्ञान बुद्धि का प्रतीक,
सुरीली तेरी तान है, जब छेड़े तू वीणा पर गीत।
ऐसे ही तुम तान छेड़ो, हर तरफ हरियाली फैले,
सभी जीव मस्त हो नाचें, जग में खुशहाली फैले॥