कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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कैसे करूँ मैं तेरी व्याख्या!
कैसे कहूँ मैं तेरी कथा!
तू तो बस मन की गाथा,
तू तो बस आँखों का आँसू।
झरने जैसे बह निकले,
तुम आँखों की गलियों से।
शब्द-शब्द भी जोडूं तो,
तुम ना मिले मेरे मन में।
जब भी याद आते हैं वह,
पर आँखों से तुम बहते हो।
गोद में तेरे सिर रख कर,
कितने पल हम रोए थे।
मिले थे जब तुम राहों में,
बाँहों में छिपा आँसू पोंछे थे।
कैसे व्याख्या करूँ प्रेम की!
बस आँखों का आँसू हो तुम॥