सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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समुद्र मंथन हुआ था जिसमें
निकले रत्न अनेक
बाँट लिया मिल सुर-असुरों ने
नहीं किया था कोई भेद,
पर जब पहला रत्न था निकला
बड़ा विषैला कालकूट विष
ग्रहण नहीं उसको कर पाया
विषय बड़ा गंभीर था खेद।
महादेव तब आगे आये
लिया उन्होंने गरल उड़ेल
कंठ में रखा उसे आपने
नीलकंठ का यह था खेल,
और बहुत से रत्न थे निकले
पर जब निकला मधुमय पेय
अमृत कलश देख सब हर्षित
किसको मिलेगा पहले पेय।
हुए अवतरित मोहिनी रूप में
विष्णु जी ने किया ये काम,
एक हाथ में पकड़ी मदिरा
और दूजे में अमृत का जाम।
देते एक से असुर को मदिरा
दूजे देव को अमृत की धार,
एक असुर ने देख लिया तब
किया उपद्रव बिगड़ा काम॥