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अकेला चलता पथिक

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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कांधे पर संघर्षों का भार,
आँखों में सपने हज़ार
मंज़िल की राह पर चला अकेला,
पथिक न माने कभी भी हार।

नहीं राह आसान लक्ष्य की,
पर मन में अटूट विश्वास है
मिल ही जाएगी मंज़िल उसको,
साहस और धीरज जिसके पास है।

थकने पर भी जो रुके नहीं,
वही लक्ष्य तक जाता है
अकेले चलना जो सीख गया,
वह भीड़ में कभी न खोता है।

अकेला चलता पथिक जब,
हौसलों के दीप जलाए
मुश्किलों का अँधियारा कितना भी हो,
वह मंज़िल को पा ही जाए।

दीप बनकर जो खुद जलता है,
राहों को रोशन करता है।
परिश्रम से जो डरता नहीं,
वही इतिहास रचता है॥