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मन में सौ-सौ द्वंद चले

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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माँ-बाप की छाँव तले,
बड़े प्यार से हम थे पले
ज्यों-ज्यों अपनी उम्र बढ़ी,
दबते गए हम बोझ तले।

बड़ी-बड़ी चाहत थी मन में,
और दुनिया रंग-रंगीली थी
हरदम खुशियाँ ही मन भाए,
पर सुख-दु::ख बनी सहेली थी।

ख्वाब सुनहरे थे देखे, और,
हर चाहत से उम्मीद जुड़ी
अरमानों के पंख लगे थे,
ख्वाहिश रह न जाए अधूरी।

पर चाहत पर वश न चला,
जो मिला लगा वही भला
गुजरे वक्त ने यही सिखाया,
जो किस्मत में था वही मिला।

अब ना कोई चाहत मन में,
अब ना किसी से कोई गिला
बड़ा सुकून इस उलझन में,
जो भी मिला सो बहुत मिला।

जीवन अब तो लगे तिजारत,
रिश्ते-नाते की यहाँ न कीमत
खुद को अब समझा लें अच्छा,
जीवन की अब यही हकीकत।

धड़कन में था जिसे बसाया,
वो पास नहीं, अब दूर हुए
औरों की मंजिल को तराशा,
और खुद मंजिल से दूर हुए।

जीवन की अब शाम सुहानी,
आशा, उम्मीद के दीप जले
भूत, भविष्य, वर्तमान दिखता,
मन में सौ-सौ द्वंद चले।

जीवन क्या है समझ में आया,
जब हम जीने को मजबूर हुए।
कुछ पल थे मतलब के रिश्ते,
सब एक-एक कर दूर हुए॥