◾साहित्य अकादमी मप्र ने किया राष्ट्रचेता स्व. गुरुदत्त स्मृति में अंतर्राष्ट्रीय साहित्य संवाद आयोजन
भोपाल (मप्र)।
तुष्टिकरण की नीति के चलते ‘वन्दे मातरम्’ गीत का विभाजन किया गया था।
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् एवं मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के आयोजकत्व में राष्ट्रचेता स्व. गुरुदत्त स्मृति में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय साहित्य संवाद ‘वंदे मातरम् सार्द्धशती’ आयोजन में यह बात मुख्य अतिथि प्रदेश शासन के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कही। इसका शुभारम्भ एनआइटीटीटीआर (श्यामला हिल्स) में सुबह उद्घाटन सत्र से हुआ। शुभारंभ साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना का सर्वश्रेष्ठ उपमान ‘वन्दे मातरम्’ गीत में मिलता है।
इसके पश्चात स्वस्ति वाचन की मधुर प्रस्तुति डॉ. रागिनी भूषण (जमशेदपुर) ने दी। ‘वंदे मातरम् गीत विभाजन से राष्ट्र विभाजन की यात्रा’ विषय पर बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि लम्बे समय तक जब देश एक सूत्र में बंधने के लिए विकल्प खोज रहा था, तभी ‘वन्दे मातरम्’ की रचना हुई, जो केवल गीत नहीं, बल्कि मंत्रों का अवतरण है।
सत्र की अध्यक्षता ऋषि कुमार मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि क्रांतिकारी लेखक आदरणीय गुरुदत्त का स्मरण इस आयोजन की प्रमुख विशेषता है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी दुबे ने किया। प्रथम सत्र ‘वंदे मातरम् का समय संदर्भ’ विषय पर आयोजित हुआ, जिसमें पूर्व सचिव मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि चेतना के उच्च शिखर पर लिखा गया गीत मंत्र बन जाता है और उसकी शक्ति उसकी सम्पूर्णता में निहित होती है। खंडित मंत्र प्रभावशाली नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ‘वन्दे मातरम्’ का विभाजन नहीं होता, तो १९४७ का भारत विभाजन भी नहीं होता। ‘वंदे मातरम्’ के गीत-संगीत पक्ष पर अशोक जमनानी ने कहा कि इस गीत की समीक्षा नहीं की जाती है, बल्कि दर्शन किया जाता है। यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा मणिप्रवाल शैली में रचित है, जिसमें शास्त्र और लोक दोनों का समन्वय है। इस सत्र की अध्यक्षता नरेन्द्र पाठक ने की। संचालन डॉ. अन्नपूर्णा सिसोदिया द्वारा किया गया।
🔹सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक पहुंचना अत्यंत आवश्यक-
द्वितीय सत्र ‘बाल साहित्य में राष्ट्र वंदना’ विषय पर आयोजित हुआ, जिसमें गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि राष्ट्र की अवधारणा अत्यंत व्यापक है और बाल साहित्य में राष्ट्रप्रेम की भावना का समावेश आवश्यक है। इसके पश्चात स्वरांगी साने ने आधुनिक माध्यमों में ‘वंदे मातरम्’ की अभिव्यक्ति पर कहा कि आज के युग में सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक पहुंचना अत्यंत आवश्यक है तथा ‘वंदे मातरम्’ को व्यापक स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए। सत्र की अध्यक्षता डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने बच्चों को संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया और संस्कारयुक्त शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। संचालन कीर्ति सिंह गौड़ द्वारा किया गया।
🔹भारत आना मायके आने जैसा अनुभव-
तृतीय सत्र ‘भारत से बाहर भारत का वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर केंद्रित रहा। रूस से आई श्वेता सिंह ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल गीत नहीं, बल्कि हमारी चेतना है और यह भारत-रूस के सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करता है। श्रीलंका से आई प्रो. आर.के.डी. निलती राजपक्ष ने कहा कि भारत आना मायके आने जैसा अनुभव है तथा हिंदी भाषा विश्वभर में अपनी पहचान बना रही है। सत्र की अध्यक्षता जवाहर कर्णावट ने करते हुए कहा कि प्रवासी भारतीयों ने विश्वभर में भारत की संस्कृति का विस्तार किया है।
संचालन डॉ. अनुराधा शुक्ला द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का समापन ‘गाथा वंदे मातरम्’ की कथा-कथन प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसकी प्रभावशाली प्रस्तुति भारती दीक्षित ने दी।
🔹देश मस्तिष्क का नहीं, हृदय का विषय-
भोपाल में अंतर्राष्ट्रीय साहित्य संवाद के द्वितीय दिवस का आयोजन भी भव्यता से हुआ। द्वितीय दिवस का उद्घाटन सत्र भी एनआइटीटीटीआर में आदित्य गुप्ता द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से प्रारम्भ हुआ। इसके पश्चात ‘लोक साहित्य में देशभक्ति के विविध आयाम’ विषय पर डॉ. श्याम सुंदर दुबे ने विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान देते हुए कहा कि लोक साहित्य ने चारों धाम की यात्रा को मोक्ष यात्रा के रूप में स्थापित किया और वहाँ से लाई गई प्रतीकात्मक वस्तुओं के माध्यम से लोक ने देश को जाना। लोक ने पग-पग चलकर देश को समझा है-लोक के पास राजसत्ता का नहीं, बल्कि एक जीवंत देश का अनुभव है। देश मस्तिष्क का नहीं, हृदय का विषय है, और देश को जानने के लिए लोक को जानना आवश्यक है।
कार्यक्रम में डॉ. क्षमा कौल (कश्मीर) ने ‘स्त्री चेतना के भारतीय प्रतिमान’ विषय पर कहा कि जो बालिकाएं अज्ञानवश अपने शरीर को केवल अपनी इच्छा का विषय मानती हैं, वे दया की पात्र हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए समाज और वातावरण में सुधार आवश्यक है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. मुकेश ने कहा कि आज हमारी जो पहचान शेष है, वह लोक के कारण ही है, क्योंकि लोक सदैव सभी भ्रमों से दूर रहता है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शोभा जैन ने किया।
🔹गुरुदत्त जी अत्यंत अध्ययनशील रहे-
द्वितीय सत्र की शुरुआत करते हुए डॉ. रागिनी भूषण ने कहा कि आधुनिक शिक्षा के कारण हम वेदों की वैज्ञानिकता को समझने में सक्षम हो रहे हैं। इस सत्र में स्व. गुरुदत्त के कृतित्व पर रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा कि हिंदी सृजनकर्ताओं में गुरुदत्त जी अत्यंत अध्ययनशील रहे। उन्होंने वेदान्त दर्शन पर जो कार्य किया, वह अद्वितीय है तथा लगभग २०० पुस्तकों की रचना की। सत्र की अध्यक्षता डॉ. मनमोहन प्रकाश श्रीवास्तव ने करते हुए कहा कि गुरुदत्त जी के रचना संसार में भारतीय समाज की पीड़ा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
आयोजन में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन निदेशक डॉ. विकास दवे ने किया। शाम को समापन सत्र में डॉ. उमेश सिंह ने कहा कि हमारी ज्ञान परम्परा दृष्टा परम्परा रही है-हमारे ऋषि मंत्रों को ‘देखते’ थे।
अंत में आभार प्रदर्शन करते हुए डॉ. दवे ने कहा कि भारत एक मृत्युञ्जय राष्ट्र है। उन्होंने उपस्थित सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।