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सामाजिक कलंक है मानव अंग तस्करी

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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लालच का यह खेल देखकर बहुत दुःख होता है। अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए इंसान कितना गिर सकता है, यह सोचकर मन विचलित हो उठता है। देश के नोएडा, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, मेरठ आदि न जाने कितने शहरों-राज्यों में मानव अंगों की अवैध खरीद-फरोख्त का धंधा जोरों पर है।
हाल ही में कुछ शहरों में पुलिस ने ऐसे रैकेट चलाने वालों को पकड़ा है, जिनमें मुख्य रूप से पढ़े-लिखे चिकित्सक शामिल थे। यह कैसी पैसे की भूख है, जिसके लिए वे अपना ज़मीर बेच रहे हैं ? मानव सेवा की भावना को पूरी तरह छोड़ चुके इन लोगों ने मानव अंगों की अवैध तस्करी का एक संगठित चक्रव्यूह बना रखा है। आश्चर्य की बात यह है, कि केवल नोएडा और दिल्ली में ही ५० से अधिक अस्पताल जांच के घेरे में हैं।
कम समय में बिना मेहनत के अमीर बनने के सपने भले ही आकर्षक लगते हों, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसने हमें इंसान बनाया है, उसके घर देर है, अंधेर नहीं। उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती। गोरखधंधे करने वालों का अंत हमेशा बुरा ही होता है। ऐसे लोगों को कभी आत्मशांति नहीं मिल सकती, जो मनुष्य के अंगों का सौदा करते हैं।
सोचने की बात है, कि इतने पढ़े-लिखे, अति शिक्षित लोग क्या इसी काम के लिए शिक्षित हुए थे ? सामाजिक दृष्टि से मानव अंगों की तस्करी एक दूषित मानसिकता का परिचायक है। जो लोग अपना घर भरने के लिए दूसरों को लूटते हैं, वे समाज के लिए अभिशाप हैं।
वर्तमान समय में मानव अंगों की तस्करी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। इसमें शामिल लोग नए-नए तरीकों से भोले-भाले लोगों को थोड़े पैसों के लालच में फंसाते हैं और फिर उनके अंगों को विदेशों में ऊँचे दामों पर बेचते हैं। इसे रोकने के लिए हम सभी को आगे आना होगा।
सही और गलत का मूल्यांकन करना आवश्यक है। जब तक सामाजिक स्तर पर ऐसे लोगों को बेनकाब नहीं किया जाएगा, तब तक यह समस्या और भी घातक सिद्ध होगी। कानून और पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे, लेकिन समाज की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
हमें अपनी सोच भी बदलनी होगी—”हमें क्या करना, हमें क्या लाभ ?”—ऐसी मानसिकता को त्यागना होगा। देश में जहां भी कुछ गलत हो रहा हो, उसे समझना और उसके खिलाफ खड़ा होना जरूरी है। यदि हम चुप रहेंगे, तो ऐसे काले धंधे करने वालों के हौसले और बढ़ेंगे।

मानव तस्करी के खिलाफ सभी को मिलकर आवाज़ उठानी होगी। मानव अंगों की तस्करी एक सामाजिक कलंक है। आज आदमी, आदमी को चंद पैसों के लिए लूट रहा है—यह अत्यंत चिंताजनक और दुखद स्थिति है। ऐसे लोगों के चेहरे समाज के सामने बेनकाब होने चाहिए। मानवता को शर्मसार करने वाला यह दानवी चेहरा सच में अत्यंत पीड़ादायक है।