कुल पृष्ठ दर्शन : 12

नहीं समझा मेरे त्याग को

राधा गोयल
नई दिल्ली
******************************************

अब तक तो सबकी खुशियों की खातिर जीती आई थी,
सबकी खुशियों की खातिर अपनी खुशी मारती आई थी।

किंतु किसी ने कभी नहीं समझा मेरे इस त्याग को,
सोच लिया अब स्वयं बनाना होगा अपने भाग्य को।

जब मैंने अपनी इच्छा से जीने की कुछ कोशिश की,
बर्दाश्त ना हुआ लोगों को, कानों में कानाफूसी की।

कानों-कान मुझे भी इसकी थोड़ी भनक लग चुकी थी,
किन्तु मुझे अब लिखने की थोड़ी-सी सनक पड़ चुकी थी।

कहते हैं लोग कहें कुछ भी, अब मुझे कोई परवाह नहीं,
अपनी इच्छा से जीने की मुझको थोड़ी-सी चाह रही।

लेकिन मेरी चाहत का हाय कैसा अंजाम हुआ,
जहर नाग-सा उगला और लोगों में मुझे बदनाम किया।

जहर उगलते रहें लोग मुझको कोई परवाह नहीं,
अपनी इच्छा से जीना है, अब तो केवल चाह यही।

धन-दौलत की कोई चाह नहीं, बस केवल अपने भावों को,
शब्दों में ढ़ालकर उन्हें बनाना चाहती हूँ एक माला को।

अब शाम आ गई जीवन की, कुछ तो अपनी खातिर जी लूँ,
जीवन थोड़ा-सा शेष रहा, वो अपनी इच्छा से जी लूँ॥