सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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माँ की थी वह प्यारी लल्ली
नहीं कबूतर चिड़िया बिल्ली,
तितली-सी वह घूम के आती
माँ उसको रहती सहलाती।
चीर-हरण एक बार हो गया
कृष्ण न आए मौन सो गया,
दु:ख देने वाला था अपना
टूटा उसका सारा सपना।
व्यथा हृदय की कही न जाए
विकल वेदना बहती जाए,
प्रलय मेघ पहचान बन गई
मातृ-नेह निर्वाण बन गई।
प्रभु मेरे अब राह दिखाओ
अपनी पलकों बीच बिठाओ,
उर झंझा को शांत कराऊँ
मैं मेरा अभिमान उठाऊँ।
मिला उसे भी एक सहारा,
बिन पत्नी का वह बेचारा।
दोनों की फिर बन गई जोड़ी,
प्रभु ने उनकी किस्मत मोड़ी॥