धन ऋण का जीवन जीती हूँ
विजयलक्ष्मी विभा इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)************************************ मैं तो एक आपबीती हूँ,मेरी कोई राह न मंजिलधन ऋण का जीवन जीती हूँ। मैं हूँ एक मूलधन विधि का,विश्व बैंक में जमा आज हूँकुछ अनुभव प्रति क्षण की दर से,स्वयं दिलाती उसे ब्याज हूँ।एक भविष्य सदा है आगे,एक अतीत अभी बीती हूँ। मैं हूँ पूंजी ऐसी जग में,आगे बढ़ती पीछे घटतीएक तरफ … Read more