हमें दूर कर न पाए कोई

ममता सिंहधनबाद (झारखंड)***************************************** मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई,मेरे दिल में तुम बसे हो और नहीं कोई। साँवली-सी सूरत मनभावनी-सी मूरत,उस पर हँसी तेरी दिल को लुभाए कोई। जबसे तुम मिले हो जान ही न बच पायी,तन तो मेरे पास है, मन ले गया है कोई। वो तो इक छलिया है, छल ही कर … Read more

मानसिक जकड़-बंदी

नीलम प्रभा सिन्हाधनबाद (झारखंड)********************************************* मेरे मित्र के मन की रंगभूमि परमानसिक जकड़-बंदी है,यह समाज का पहरा भी नहीं,फिर भी न जाने कैसे बंदी है। अपने विचारों को जाहिर करनाएक द्वंद्व-युद्ध के समान है,यह एक ऐसा अँधेरा फैलाता है-जहाँ अच्छी विचारधारा का प्रवाह भी बंद है। मानसिक जकड़-बंदी से ऊपर उठकरआगे बढ़ना हर मानव चाहता है,लेकिन … Read more

मातम

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** चारों ओर सिर्फ सन्नाटा नहीं,बल्कि एक ऐसा मातम पसरा हैजो चीखता है, रोता हैअपनों को खो देने के ग़म से बेहाल।जले हुए शरीर,पहचान के इंतज़ार में है उनके अपनेकांपते हाथों और डरे हुए दिलों के साथ,डीएनए सैंपलिंग के लिए आ रहे हैं। हर एक चेहरे पर बस एक ही सवाल-“आख़िर हमारे अपनों … Read more

एक अकेला तारा

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* तम की भीड़ों झिलमिल करता, सदैव एक अकेला तारा,ज्यों सच्चाई कही, भीड़ में है कोई सज्जन बेचारा। झूठों की महफ़िल में अक्सर, जो सत्य सुपथ ही ठुकराया,फिर भी राह दिखाता जग को, होता दीपक-सा उजियारा। घोर अमावस में भी जिसने दिल आशा का गीत सँवारा,वह अम्बर में टँगा हुआ-सा … Read more

अनुपम अनुराग हो गया

डॉ. गायत्री शर्मा ’प्रीत’इन्दौर (मध्यप्रदेश )******************************************* बागों की बयार से, अनुपम अनुराग हो गया,इस जगत की उलझनोंं से, अजब विराग हो गया। कभी छाया मिलती है, कभी धूप कड़ी लगती,मधुबन की घनी छाँव से, तो अनुराग हो गया। कभी फूल खिलते हैं, कभी काँटे हैं बेशुमार,फूलों वाली नगरी से, तो मन पराग हो गया। कभी … Read more

तेरी सुनहरी यादों को लिए…

डॉ. श्राबनी चक्रवर्तीबिलासपुर (छतीसगढ़)************************************************* कोई दिन नहीं जब मैं रोई नहीं,कितनी रातों से मैं सोई नहीं। थक गई हूँ तुम्हारी राह तकते-तकते,पता है कि तुम फिर कभी आ नहीं सकते. दिन तो निकल जाता है काम के बोझ से,शामें गुज़रती नहीं चाय या कॉफ़ी की दौर से। यूँ तो सब है मेरे आस-पास,तुम्हारे बिना न … Read more

सृजन की पहचान हो

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* नारी तेरे रूप अनेक, करुणा की तू धार हो,ममता की गागर भरे, करती जग उद्धार होसंकोच की चादर तले, है गहन शक्ति अपार,नवधा मातृका रूप में, जग का आधार हो। नारी तेरे रूप अनेक, त्याग तपस्या रूप हो,कभी अन्नपूर्णा बनी, कभी दुर्गा स्वरूप होसंकोच भरे नयनों में, है साहस … Read more

विरह का संगीत

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’,हैदराबाद (तेलंगाना)*************************************************** विरह की वेदना ने मुझे पत्थर बना दिया,पर भीतर प्रेम का दीप जलता रहा। आँसुओं की धारा बहती है निरंतर,उसमें डूबा है मेरा मन, मेरा अंतर।तेरे बिना कोई रंग नहीं, कोई राग नहीं,तेरे बिना कोई सुख नहीं, कोई भाग नहीं। विरह की वेदना ने मुझे मौन कर दिया,पर भीतर प्रेम … Read more

आज की विभीषिका

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरेमंडला(मध्यप्रदेश)******************************************* चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार।जाने कैसा हो गया, अब तो यह संसार॥ आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर।घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर॥ अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त।दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।। अमरीका इजरायला, और आज ईरान।नहीं नियंत्रित आज ये, धारें … Read more

क्या लिखें ?

संजय एम. वासनिकमुम्बई (महाराष्ट्र)************************************* क्या लिखें, कैसे लिखें,किस बात पर लिखेंरोज-रोज अख़बारों की सुर्खियोंइलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया,सोशल मीडिया और लोगों की बातेंसुन, पढ़ और सोच-सोच कर,मन मेरा सुन्न हो जाता है। मासूम-सी गुड़ियों से लेकर,उम्र दराज महिलाएँ भीनहीं छूटतीं दरिंदों के शिकंजे से,किंतु छूट जाते हैं दरिंदे बेख़ौफ़उनके छूटने का जश्न मनाया जाता है,और मन … Read more