दिल्ली
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महाशिवरात्रि विशेष (१५ फरवरी)….
१५ फरवरी को जब समूचा भारत ‘महाशिवरात्रि’ का पावन पर्व मनाएगा, तब यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मजागरण का विराट अवसर होगा। महाशिवरात्रि वह रात्रि है, जब साधक अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर शिवत्व के प्रकाश से उसे आलोकित करने का संकल्प लेता है। शिव केवल देवता नहीं, वे चेतना के शाश्वत आयाम हैं-महाकाल, जो समय से परे हैं, नटराज, जो सृष्टि की लय और ताल के अधिपति हैं और नीलकंठ, जो विष को पीकर भी अमृत का संदेश देते हैं। आज का युग विज्ञान, तकनीक और उपभोग का युग है। मानव ने अंतरिक्ष को नापा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित की, लेकिन अपने भीतर की शांति खो बैठा। तनाव, अवसाद, असंतोष, युद्ध, आतंकवाद और नैतिक विघटन की घटनाएँ विश्व को विचलित कर रही हैं। ऐसे दौर में शिव की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। शिव भक्ति कोई चमत्कारिक जादू नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग है।
शिव का स्वरूप द्वंद्वों से परे है। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो जड़, जर्जर और अनैतिक है, उसका विनाश आवश्यक है, ताकि नवजीवन अंकुरित हो सके। जब हम भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह का संहार करते हैं, तभी सच्चा निर्माण संभव होता है। यही शिव का वास्तविक चमत्कार है भीतर के विष का रूपांतरण। समुद्र-मंथन की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानवीय जीवन का प्रतीक है। जब संसार अमृत की खोज में लगा, तब सबसे पहले विष निकला। आज भी जब मानव प्रगति की दौड़ में है, तो साथ में प्रदूषण, हिंसा और असंतुलन का विष भी उत्पन्न हो रहा है। उस विष को कौन पीएगा ? शिव का नीलकंठ रूप हमें सिखाता है कि समाज के संकट को दूर करने के लिए त्याग और सहनशीलता आवश्यक है। जब हम अपने स्तर पर कटुता को निगल लेते हैं और उसे बाहर नहीं फैलाते, तभी समाज में शांति बनी रहती है। इसी प्रकार गंगा के अवतरण की कथा बताती है कि अनियंत्रित शक्ति विनाशकारी हो सकती है। शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण कर संतुलित प्रवाह दिया। आज के संदर्भ में यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। तकनीक, धन, सत्ता-ये सभी शक्तियाँ हैं। यदि वे अनियंत्रित हों तो विध्वंसक बनती हैं, और यदि शिव-संयम में हों तो कल्याणकारी। अतः शिव भक्ति का अर्थ है-शक्ति का संतुलन।
आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है-तनाव। प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाएं और असुरक्षा ने उसे अशांत बना दिया है। शिवरात्रि की रात्रि जागरण की रात्रि है, लेकिन यह बाह्य जागरण से अधिक आंतरिक जागरण है। जब साधक ‘ऊँ नमः शिवाय’ का जप करता है, तो वह अपने भीतर के कम्पन को संतुलित करता है। यह पंचाक्षरी मंत्र मन, प्राण और चेतना को एकाग्र करता है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि नियमित ध्यान और मंत्र जाप से तनाव कम होता है, रक्तचाप संतुलित होता है और मानसिक स्थिरता बढ़ती है। यह शिव साधना का प्रत्यक्ष प्रभाव है।
आज विश्व युद्ध और आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहा है। हिंसा की ज्वाला में मानवता झुलस रही है। शिव का तांडव केवल विनाश नहीं, बल्कि संतुलन का नृत्य है। जब अन्याय बढ़ता है, तब परिवर्तन अनिवार्य होता है। शिव का संदेश यह भी है कि क्रोध नहीं, करुणा से परिवर्तन संभव है। वे रुद्र हैं-दुःखों का हरण करने वाले। शिव भक्ति का चमत्कार यह है कि वह मनुष्य के भीतर करुणा, सहिष्णुता और क्षमा का विकास करती है। जब व्यक्ति बदलता है, तब समाज बदलता है और जब समाज बदलता है, तब विश्व में शांति का मार्ग प्रशस्त होता है। शिव और शक्ति का मिलन भी आधुनिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा, विचार और क्रिया का समन्वय है। आज परिवारों में विघटन, संबंधों में दूरी और जीवन में असंतुलन इसलिए है क्योंकि यह समरसता टूट रही है। शिवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि संतुलन ही जीवन का आधार है। आज आवश्यकता है कि शिव को केवल मंदिरों तक सीमित न रखा जाए। वे काठ, पत्थर या मूर्ति में नहीं, बल्कि भाव में निवास करते हैं। जब हम सत्य बोलते हैं, करुणा का व्यवहार करते हैं, प्रकृति की रक्षा करते हैं, तब हम शिव की आराधना करते हैं। पर्यावरण संरक्षण भी शिव भक्ति है। जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी के संतुलन की रक्षा करना ही शिव के प्रति सच्ची श्रद्धा है।
महाशिवरात्रि हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम अपने भीतर के विष को पहचानें और उसे शिवचेतना में रूपांतरित करें। हम अपने जीवन में संयम, संतुलन और साधना को स्थान दें। हम क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और अशांति के स्थान पर ध्यान को अपनाएं। शिवत्व की प्राप्ति कोई दूर की वस्तु नहीं। यह हमारे भीतर ही सुप्त है। आधुनिक युग की जटिलताओं के बीच शिव भक्ति ही वह सेतु है, जो मनुष्य को स्वयं से, समाज को शांति से और विश्व को अमन से जोड़ सकती है।