पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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आज शाम जब दीपक ऑफिस से लौट कर आया, तो घर में बाबूजी के चीखने-चिल्लाने की आवाजें गूँज रही थीं। क्रोधित बाबूजी अपनी भाषा के स्तर को भूल कर गाली-गलौज पर उतर आया करते थे, परंतु ऐसा अवसर बहुत कम ही आया करता था; क्योंकि बाबूजी बहुत शांत स्वभाव के थे। वह धार्मिक व्यक्ति थे, गीता, रामायण, भागवत और सत्संग में अपना दिन व्यतीत किया करते थे।
मैं उनके क्रोध के कारण को जानने के प्रयास में उनके कमरे में झाँक ही रहा था, कि मानों उनके क्रोध की अग्नि में समिधा और घी दोनों एकसाथ ही आहुति में डाल कर अग्नि की ज्वाला प्रज्जवलित कर दी थी।
छोटू निरीह पक्षी की भाँति बाबूजी के सामने खड़ा था। बाबूजी ने छोटू की पैंट की जेब में गुटखे की २-३ पुड़िया देख ली थी, उसी वजह से उन्होंने पूरे घर को सिर पर उठा लिया था। पूरा घर सहमा हुआ था, उन्होंने टेबिल पर रखी सारी किताबें उठा-उठा कर जमीन पर फेंक दीं थीं। छोटू चुपचाप सहमा-सा खड़ा था। ये ड्रामा लगभग २ घंटे से चल रहा था, अम्मा ने फुस-फुसा कर बताया था।
बाबूजी चिल्लाते-चिल्लाते थक कर कुर्सी पर बैठ गए थे। थोड़ी देर तक गहन चिंता की विचार मुद्रा में अपने सिर पर हाथ रख कर बैठे रहे, फिर आदत के अनुसार पुकार लगाई, “अरे कल्लू, जरा गुटखा का पाउच तो दे जा, मुँह सूखता है।”
कल्लू पुड़िया लेकर आता, उसके पहले ही छोटू ने पुड़िया वहीं से उठा कर दे दी थी। बाबूजी ने पाउच फाड़ा और अपने मुँह में उसका पाउडर डाल कर असीम तृप्ति का अनुभव किया।
छोटू ने भी बाबूजी से निगाह बचा कर १ पुड़िया मुँह में डाली और छू मंतर हो गया।
घर के माहौल को १ पुड़िया के जादू ने सामान्य कर दिया था। छोटू पुड़िया अब भी अपने जेब में रखता है, लेकिन बाबूजी की नजरों से बचा कर, क्योंकि जाने कब बाबूजी का मुँह सूख जाए।