कुल पृष्ठ दर्शन : 1

कागज़ की ढाल

डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
****************************************

डॉ. विनोद शर्मा ने ३६ घंटे जागकर परीक्षा दी थी। रैंक आई ४७वीं और सीट नहीं मिली। जिसे मिली, उसकी रैंक थी-३१२वीं, नाम था – सुरेंद्र मेघवाल। उसके पास एक प्रमाण-पत्र था, जो काफी था।

यह व्यवस्था थी। इसे स्वीकार करना था, पर जब विनोद ने अपना दु:ख कहा, तो सुरेंद्र ने कहा –
“तुम्हारे बाप-दादा ने हमारे साथ क्या किया था ? भूल गए ?”
“मेरे बाप किसान थे। किसी के साथ कुछ नहीं किया।”
“फिर भी तुम सवर्ण हो। तुम्हें भुगतना पड़ेगा।”
विनोद चुप रहा। सुरेंद्र के पिता आईएएस थे। उनके घर में ३ गाड़ियाँ थीं। और फिर भी- प्रमाण-पत्र था।
विनोद ने अपनी माँ से पूछा।
“माँ, हम किस जाति के हैं ?”
“बेटा, इंसान की।”
“तो क्या यही हमारी गलती है ?”

माँ के पास जवाब नहीं था। संविधान के पास था, पर वह जवाब अब हर किसी की ज़रूरत नहीं बना था, सिर्फ़ हथियार बन गया था।