डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के मध्य तक आते-आते ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ केवल एक तकनीकी नवाचार भर नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, कूटनीति और सामाजिक संरचना को पुनर्परिभाषित करने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी है। २०२६ का वर्ष इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, क्योंकि यह वह समय है जब ए.आई. के उपयोग और उसके नियमन के बीच वास्तविक टकराव सामने आने लगा है। दुनिया के लगभग सभी बड़े तकनीकी और राजनीतिक केंद्र इस प्रश्न से जूझ रहे हैं कि ए.आई. का विकास किस गति से हो और उसके लिए किस प्रकार का नियामक ढाँचा तैयार किया जाए। एक ओर तकनीकी कंपनियाँ नवाचार की गति को बनाए रखना चाहती हैं, वहीं सरकारें और समाज इसके संभावित जोखिमों—जैसे गोपनीयता का उल्लंघन, भेदभाव, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव और सैन्य उपयोग—को लेकर चिंतित हैं। यही कारण है कि २०२६ को कई विशेषज्ञ ‘ए.आई.गवर्नेंस का निर्णायक वर्ष’ कह रहे हैं।
विश्व स्तर पर ए.आई. नियमन की बहस का सबसे प्रभावशाली उदाहरण यूरोपीय संघ का ए.आई. अधिनियम है। यह दुनिया का पहला व्यापक और बाध्यकारी कानून है जो ए.आई. प्रणालियों को जोखिम के आधार पर वर्गीकृत करता है और उनके उपयोग पर स्पष्ट नियम लागू करता है। यह कानून अगस्त २०२४ में लागू हुआ और इसके कई प्रमुख प्रावधान चरणबद्ध तरीके से २०२६ तक पूरी तरह लागू होने की प्रक्रिया में हैं। इस कानून के अंतर्गत ‘अस्वीकार्य जोखिम’ वाली ए.आई. प्रणालियों—जैसे सामाजिक स्कोरिंग, जनसांख्यिकीय आधार पर निगरानी या नागरिकों को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करने वाली तकनीकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अतिरिक्त ‘उच्च जोखिम’ वाली प्रणालियों, जैसे-स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और न्यायिक निर्णय से संबंधित ए.आई. अनुप्रयोगों के लिए कठोर पारदर्शिता और जवाबदेही के मानक तय किए गए हैं। इस कानून का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर ३.५ करोड़ यूरो या उनके वैश्विक वार्षिक कारोबार के ७ प्रतिशत तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, जो तकनीकी नियमन के इतिहास में सबसे कठोर दंडात्मक प्रावधानों में से एक है।
यूरोपीय संघ का यह मॉडल वैश्विक स्तर पर ए.आई. शासन की दिशा तय करने का प्रयास है। कई विशेषज्ञ इसे डेटा संरक्षण कानूनों के क्षेत्र में लागू हुए जीडीपीआर की तरह मानते हैं, जिसने वैश्विक डेटा सुरक्षा मानकों को प्रभावित किया था। इसी प्रकार ए.आई. अधिनियम भी वैश्विक कंपनियों को अपनी तकनीकों में पारदर्शिता, मानव निगरानी और जोखिम मूल्यांकन के मानकों को शामिल करने के लिए बाध्य कर रहा है। इस कानून का प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, क्योंकि यदि किसी कंपनी की ए.आई. सेवा यूरोपीय उपभोक्ताओं को प्रभावित करती है, तो उसे इन नियमों का पालन करना होगा।
दूसरी ओर अमेरिका का दृष्टिकोण इससे काफी अलग है। अमेरिका तकनीकी नवाचार को बाधित किए बिना ए.आई. के सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देने के पक्ष में है। दिसंबर २०२५ में जारी एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से अमेरिकी प्रशासन ने राष्ट्रीय ए.आई. नीति के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए। इस आदेश में ए.आई. सुरक्षा, पारदर्शिता, श्रम बाजार पर प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, किंतु अमेरिका में यूरोप जैसा एकीकृत कानून नहीं है; वहाँ संघीय स्तर के साथ-साथ राज्यों के स्तर पर भी अलग-अलग नियम बनाए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, इलिनॉय, कैलिफोर्निया व कोलोराडो जैसे राज्यों ने रोजगार, बायोमेट्रिक डेटा और एल्गोरिथमिक निर्णयों से संबंधित ए.आई. के उपयोग पर अलग-अलग नियम लागू किए हैं। इस बहुस्तरीय नियामक ढाँचे के कारण अमेरिका में ए.आई. शासन का परिदृश्य अपेक्षाकृत बिखरा हुआ है।
उधर, चीन का मॉडल इन दोनों से भिन्न है। चीन ने ए.आई. को राष्ट्रीय शक्ति के एक रणनीतिक साधन के रूप में अपनाया है और उसका नियामक ढाँचा मुख्यतः राज्य नियंत्रण, डेटा स्थानीयकरण और सामाजिक स्थिरता के सिद्धांतों पर आधारित है। चीन ने एल्गोरिथमिक अनुशंसा प्रणालियों, जनरेटिव ए.आई. और साइबर सुरक्षा से संबंधित कई नियम लागू किए हैं। २०२६ से लागू संशोधित साइबर सुरक्षा और डेटा नियमन कानूनों में ए.आई. का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इनके माध्यम से चीन सरकार तकनीकी कंपनियों पर कड़ी निगरानी रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि ए.आई. का उपयोग राज्य की नीतियों और सामाजिक नियंत्रण के ढाँचे के अनुरूप हो।
इस प्रकार वैश्विक स्तर पर ए.आई. शासन के ३ प्रमुख मॉडल उभर कर सामने आए हैं—यूरोपीय संघ का अधिकार-आधारित और जोखिम-आधारित मॉडल, अमेरिका का नवाचार-अनुकूल और अपेक्षाकृत लचीला मॉडल तथा चीन का राज्य-नियंत्रित मॉडल। इन तीनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करना २०२६ की सबसे बड़ी तकनीकी-कूटनीतिक चुनौतियों में से एक बन गया है, क्योंकि ए.आई. तकनीक की प्रकृति वैश्विक है, जबकि उसके नियमन के ढाँचे राष्ट्रीय सीमाओं में बँधे हुए हैं।
ए.आई. शासन की बहस केवल तकनीकी या कानूनी प्रश्न नहीं है; इसके पीछे गहरे आर्थिक और भू-राजनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं। ए.आई. तकनीक आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुकी है। उदाहरण के लिए चीन की डीपसीक जैसी कंपनियों ने कम लागत में बड़े ए.आई. मॉडल प्रशिक्षित करने की नई तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिससे अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के प्रभुत्व को चुनौती मिली है। दूसरी ओर, चिप निर्माण और ए.आई. हार्डवेयर के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियाँ अभी भी अग्रणी हैं।
ए.आई. शासन की चर्चा का एक महत्वपूर्ण आयाम उसका सैन्य उपयोग भी है। आधुनिक युद्ध में ए.आई.-सक्षम प्रणालियों—जैसे स्वायत्त ड्रोन, लक्ष्य पहचान एल्गोरिद्म और साइबर युद्ध तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इन प्रणालियों के कारण युद्ध की प्रकृति बदल रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशकों में युद्ध का बड़ा हिस्सा स्वचालित प्रणालियों और एल्गोरिथ्मिक निर्णयों के माध्यम से संचालित होगा।
इस वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था है और डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत में डिजिटल भुगतान, आधार पहचान प्रणाली और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म के व्यापक उपयोग ने तकनीकी नवाचार के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार किया है। इसी संदर्भ में ए.आई. को भारत की आर्थिक और सामाजिक विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। भारत सरकार की ‘इंडिया ए.आई.’ पहल और विभिन्न नीति दस्तावेजों में ए.आई. को स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और शहरी प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में परिवर्तनकारी तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालाँकि, ए.आई. शासन के क्षेत्र में भारत का दृष्टिकोण अभी भी विकसित हो रहा है। भारत ने कोई व्यापक और बाध्यकारी ए.आई. कानून अभी तक लागू नहीं किया है।
भारत के सामने ए.आई. शासन के संदर्भ में कई जटिल चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से संबंधित है। भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ-साथ नागरिकों के डेटा का विशाल भंडार तैयार हो गया है। हाल ही में पारित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून ने डेटा सुरक्षा के लिए एक बुनियादी ढाँचा प्रदान किया है, लेकिन ए.आई. के संदर्भ में इसके कई पहलुओं को और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए एल्गोरिथ्मिक पारदर्शिता, स्वचालित निर्णयों की जवाबदेही और डेटा पूर्वाग्रह जैसे मुद्दों पर अभी व्यापक कानूनी स्पष्टता नहीं है।
दूसरी चुनौती सामाजिक न्याय और समावेशिता की है। ए.आई. प्रणालियाँ अक्सर उन डेटा पर आधारित होती हैं, जो ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं से प्रभावित होते हैं। यदि इन पूर्वाग्रहों को तकनीकी प्रणालियों में शामिल कर लिया जाए, तो वे भेदभाव को और मजबूत कर सकती हैं। इसलिए भारत जैसे विविध और बहुस्तरीय समाज में ए.आई. के उपयोग के लिए विशेष सावधानी और संवेदनशीलता आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ए.आई. शासन के लिए ऐसा ढाँचा विकसित करना होगा, जो तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की रक्षा भी करे।
तीसरी चुनौती वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी है। ए.आई. के क्षेत्र में अमेरिका और चीन जैसी शक्तियाँ विशाल निवेश और अनुसंधान क्षमता के कारण अग्रणी हैं। भारत को इस प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अनुसंधान, शिक्षा और तकनीकी बुनियादी ढाँचे में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। इसके साथ-साथ वैश्विक सहयोग और मानकीकरण प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।
इन सभी पहलुओं को देखते हुए २०२६ का वर्ष ए.आई. शासन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में सामने आ रहा है। एक ओर तकनीकी विकास की गति अभूतपूर्व है, दूसरी ओर नीति-निर्माण और नियमन की प्रक्रियाएँ उससे पीछे छूटती दिखाई देती हैं। यदि इस अंतर को समय रहते संतुलित नहीं किया गया, तो ए.आई. तकनीक के लाभों के साथ-साथ उसके जोखिम भी तेजी से बढ़ सकते हैं। इसलिए आवश्यक है, कि वैश्विक समुदाय, सरकारें, तकनीकी कंपनियाँ और नागरिक समाज मिलकर एक ऐसा संतुलित ढाँचा तैयार करें जो नवाचार, सुरक्षा और नैतिकता—तीनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि भारत एक समावेशी, लोकतांत्रिक और नवाचार-अनुकूल ए.आई. शासन मॉडल विकसित करने में सफल होता है, तो वह वैश्विक ए.आई. व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मध्य मार्ग प्रस्तुत कर सकता है—एक ऐसा मॉडल जो तकनीकी प्रगति को मानव मूल्यों के साथ संतुलित करे। यही संतुलन भविष्य की डिजिटल सभ्यता की दिशा तय करेगा।