डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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कोई दिन नहीं जब मैं रोई नहीं,
कितनी रातों से मैं सोई नहीं।
थक गई हूँ तुम्हारी राह तकते-तकते,
पता है कि तुम फिर कभी आ नहीं सकते.
दिन तो निकल जाता है काम के बोझ से,
शामें गुज़रती नहीं चाय या कॉफ़ी की दौर से।
यूँ तो सब है मेरे आस-पास,
तुम्हारे बिना न आए मेरी साँसों में साँस।
रोज सुबह होती है, रोज शाम आती है,
तुम बिन मौसम में वह बात ही नहीं।
लोग फ़िक्र करते हैं खामखां मेरे लिए,
मैं तो बस जिंदा हूँ तेरी सुनहरी यादों को लिए।
होंठों पर मुस्कान चेहरे पर चमक दिखाई देती है,
किसने देखा है मेरे ग़म का अंधेरा, जो चेहरे के पीछे छुपा है ?