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धर्म और पर्यावरण संरक्षण

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता जिन २ स्तंभों पर टिकी है, उनमें से एक है – मनुष्य की आस्था और दूसरा है प्रकृति का संतुलन। जब तक ये दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे, तब तक मानव सभ्यता फलती-फूलती रही, किंतु जैसे-जैसे आधुनिकता के नाम पर मनुष्य ने प्रकृति को उपभोग की वस्तु मानना शुरू किया, वैसे-वैसे एक गहरा असंतुलन उत्पन्न होता चला गया। आज जब विश्व पर्यावरण संकट की चरम स्थिति में खड़ा है — जहाँ हिम खंड (ग्लेशियर) पिघल रहे हैं, समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, जंगल जल रहे हैं और जैव-विविधता तेज़ी से घट रही है ; तब एक फिर मानवता को उसी प्राचीन ज्ञान की ओर लौटना होगा, जिसे हमारे धर्मों ने सदियों पहले प्रतिपादित किया था।
भारत की धार्मिक परम्परा, जो संसार की प्राचीनतम जीवित परम्पराओं में एक है, पर्यावरण के साथ एक पवित्र और गहरे सम्बंध की कल्पना करती है। यहाँ नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, वे माताएँ हैं (गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा)। वृक्ष देवताओं के निवास-स्थान हैं — पीपल में विष्णु, बरगद में ब्रह्मा, तुलसी में लक्ष्मी का वास माना जाता है। पशु केवल जीव-जंतु नहीं, वे देवताओं के वाहन हैं — बाघ, मोर, हाथी, गाय, साँप सभी किसी न किसी देवता से जुड़े हैं। यह धार्मिक आस्था कोई अंधविश्वास नहीं थी, यह एक सुविचारित पारिस्थितिक दर्शन था जो प्रकृति के हर तत्व को सम्मान और संरक्षण का अधिकार देता था।

🔹वेदों में पर्यावरण चिंतन-
ऋग्वेद, जो मानवता के ज्ञात इतिहास के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक है, उसमें पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि के प्रति जो श्रद्धा प्रकट की गई है, वह आज भी प्रासंगिक है। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है — ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ अर्थात् पृथ्वी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यह एक पंक्ति पूरे वैदिक पर्यावरण-दर्शन का सार है। जब आप पृथ्वी को माता मानते हैं, तो उसका दोहन नहीं, उसकी सेवा और संरक्षण स्वाभाविक हो जाता है।
अथर्ववेद के भूमि सूक्त (विश्व की प्रथम पर्यावरण-घोषणा कहना अतिशयोक्ति नहीं) के ६३ मंत्रों में पृथ्वी की प्रकृति, जैव-विविधता और मानव के उत्तरदायित्व का वर्णन करता है। इसमें वनस्पतियों, जल-स्रोतों, पर्वतों और सभी जीवों के प्रति आदर का भाव व्यक्त किया गया है। यजुर्वेद में शांतिपाठ के माध्यम से द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधि, वनस्पति — सभी के लिए शांति की कामना की गई है। यह प्रार्थना पर्यावरणीय समग्रता का उत्कृष्ट उदाहरण है। सामवेद और यजुर्वेद में वायु और जल की शुद्धता के लिए अनेक यज्ञों का विधान है। ये यज्ञ केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं थे, बल्कि वायुमंडल को शुद्ध रखने, वर्षा को आकर्षित करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के वैज्ञानिक उपाय भी थे।
उपनिषदों में ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’- अर्थात् “यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म है” का दार्शनिक सिद्धांत पर्यावरण नैतिकता की आधारशिला है। जब आप प्रत्येक वृक्ष, नदी, पर्वत और जीव में ब्रह्म का अंश देखते हैं, तो उनके विनाश की कल्पना भी पाप बन जाती है। ईशावास्योपनिषद का पहला श्लोक ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’ — यही कहता है, कि इस जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से आच्छादित है। इसलिए किसी के भी भाग पर लालच मत करो।


🔹हिंदू परम्परा में प्रकृति-पूजा : जीवंत पर्यावरण-शास्त्र-

हिंदू धर्म में पर्यावरण संरक्षण केवल एक नैतिक आदेश नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक व्यवहार है जो त्योहारों, संस्कारों और दैनिक आचरण में गहराई से समाया हुआ है। हरेला पर्व, जो उत्तराखंड में मनाया जाता है, वृक्षारोपण का उत्सव है। वन महोत्सव की जड़ें इसी परम्परा में हैं। पिपलांतरी गाँव, राजस्थान का वह अनुपम उदाहरण, जहाँ लड़की के जन्म पर १११ पेड़ लगाए जाते हैं, यह हिंदू संस्कारों की प्रकृति-प्रियता का प्रमाण है। नवग्रह वाटिका, पंचवटी, और अशोक वन की अवधारणाएँ वनस्पति-संरक्षण की सुव्यवस्थित प्रणालियाँ थीं।
बिश्नोई समुदाय (राजस्थान के थार मरुस्थल में बसता है) हिंदू पर्यावरण-चेतना का जीवंत प्रतीक है। १७३९ ईस्वी में जब जोधपुर के महाराजा के सैनिक खेजड़ी के पेड़ काटने आए, तो अमृता देवी बिश्नोई ने प्राण देकर उन पेड़ों की रक्षा की। उनके साथ ३६३ अन्य बिश्नोइयों ने भी अपनी जान दी। यह विश्व का पहला चिपको आंदोलन था- चिप्को आंदोलन से २४२ वर्ष पहले। बिश्नोई समुदाय के २९ नियमों में से अनेक पर्यावरण संरक्षण से संबंधित हैं — पेड़ न काटना, हरे पत्ते न तोड़ना, जीव-जंतुओं को न मारना। गुरु जम्भेश्वर ने १५वीं शताब्दी में ये नियम इसलिए बनाए थे, क्योंकि वे समझते थे कि मरुस्थल में जीवन का अस्तित्व वृक्षों और जीवों के संरक्षण पर निर्भर है।


🔹इस्लाम और पर्यावरण : खलीफा की जिम्मेदारी-
इस्लाम में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा ‘खिलाफत’ के सिद्धांत पर आधारित है। अल्लाह ने मनुष्य को पृथ्वी पर अपना खलीफा (प्रतिनिधि) बनाया है — और एक खलीफा का दायित्व विनाश का नहीं, बल्कि देख-रेख और संरक्षण का है। पवित्र कुरान में कहा गया है “फसाद (भ्रष्टाचार /विनाश) न फैलाओ पृथ्वी पर, जब कि इसे सुधारा जा चुका है।” (सूरह अल-अराफ ७:५६) यह आदेश पर्यावरण-विनाश के विरुद्ध सीधी चेतावनी है।
पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा था “यदि कयामत का दिन आ जाए और तुम्हारे हाथ में एक पौधा हो, तो भी उसे लगाओ।” यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण उद्धरण है, जो दीर्घकालिक सोच और पर्यावरण-प्रतिबद्धता को धार्मिक कर्तव्य बनाता है।
२०१५ में प्रकाशित ‘इस्लामिक डिक्लेरेशन ऑन ग्लोबल क्लाइमेट चेंज’ (६० से अधिक देशों के इस्लामी विद्वानों ने हस्ताक्षरित किया) में कहा गया, कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देश, अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब मुस्लिम देश हैं। इसलिए, जीवाश्म ईंधन से शीघ्रातिशीघ्र मुक्ति पाना एक इस्लामी कर्तव्य है। यह घोषणा आधुनिक इस्लामी पर्यावरण-चेतना का प्रतीक है।


🔹बौद्ध धर्म और प्रकृति : अहिंसा का विस्तार-
बौद्ध धर्म में पर्यावरण-नैतिकता की जड़ें ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ के मूल सिद्धांतों में हैं। बुद्ध का जन्म लुम्बिनी के एक उद्यान में हुआ, उन्हें ज्ञान बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे मिला, और उनका प्रथम उपदेश सारनाथ के मृगदाव (हिरण उद्यान) में हुआ — यह संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ बौद्ध दर्शन के गहरे सम्बंध का प्रतीक है।
तिब्बती बौद्ध धर्म में पर्यावरण संरक्षण की ‘रिग्पा’ परम्परा है, जिसमें पर्वतों, नदियों और झीलों को पवित्र मानकर उनकी सुरक्षा की जाती है। दलाई लामा ने १९९२ में रियो पृथ्वी सम्मेलन में और २०१५ में पेरिस जलवायु सम्मेलन से पूर्व पर्यावरण संरक्षण के लिए आह्वान किया।


🔹जैन धर्म : पर्यावरण-नैतिकता का शिखर-
जैन धर्म (संभवतः विश्व का सर्वाधिक पर्यावरण-केंद्रित धर्म) की नींव ‘अहिंसा’, ‘अपरिग्रह’ और ‘अनेकांतवाद’ पर है। जैन दर्शन में सिर्फ पशु-पक्षी ही नहीं, बल्कि वनस्पति, पृथ्वी, जल और वायु में भी जीव (प्राण) का वास माना जाता है। इसलिए जैन साधु-साध्वियाँ मुँह पर पट्टी बाँधते हैं ताकि साँस लेने से सूक्ष्म जीवों की हत्या न हो, और चलते समय जमीन देखकर चलते हैं ताकि कोई कीड़ा न कुचले। यह अहिंसा का ऐसा विस्तार है, जो आधुनिक ‘एनिमल राइट्स’ और ‘बायोसेंट्रिक एथिक्स’ से भी आगे जाता है। जैन समुदाय का वैश्विक जनसंख्या में अनुपात ०.३७ फीसदी है, किंतु पर्यावरणीय दृष्टि से वे सबसे कम कार्बन फुटप्रिंट वाले समुदायों में से हैं। गुजरात और राजस्थान में जैन समुदाय द्वारा संचालित पशु-चिकित्सालय (पिंजरापोल), जहाँ घायल और बीमार पशुओं की देखभाल होती है, जैव-विविधता संरक्षण का व्यावहारिक उदाहरण हैं।


🔹सिख धर्म : धरती माता की सेवा-
सिख धर्म में पर्यावरण-संरक्षण ‘सेवा’ (नि:स्वार्थ सेवा) और ‘किरत करो’ (परिश्रम करो) के सिद्धांतों से जुड़ा है। गुरु नानक देव जी ने कहा था — ‘पवन गुरु, पाणी पिता, माता धरत महत्त।’ अर्थात् वायु गुरु है, जल पिता है और धरती महान माता है। यह एक पंक्ति सिख पर्यावरण दर्शन का सार है। गुरुग्रंथ साहिब में प्रकृति के प्रति श्रद्धा के अनेक संदर्भ हैं।
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का लंगर — जहाँ प्रतिदिन १ लाख से अधिक लोगों को निःशुल्क भोजन मिलता है ; पर्यावरण की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है।


🔹स्वदेशी परम्पराएँ और आदिवासी पर्यावरण-ज्ञान-
भारत की आदिवासी परम्पराओं में पर्यावरण-संरक्षण का जो ज्ञान है, वह हजारों वर्षों के अनुभव पर आधारित है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समुदाय अपने देवी-देवताओं को वनों, पहाड़ों और नदियों में मानते हैं। ‘सरना’ परम्परा में ‘जाहेर थान’ पवित्र वन की रक्षा का धार्मिक कर्तव्य है। इन पवित्र वनों को ‘देवी का जंगल’, ‘कावु’, ‘देवराई’, ‘जहेरबन’ आदि नामों से जाना जाता है। २००६ के एक अध्ययन के अनुसार भारत में १ लाख से अधिक पवित्र वन हैं, जो कुल मिलाकर लाखों हेक्टेयर भूमि की रक्षा करते हैं।


🔹वर्तमान पर्यावरण संकट और धर्म की भूमिका-
आज जब हम पर्यावरण संकट के आँकड़े देखते हैं, तो स्थिति की गंभीरता स्पष्ट होती है। इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की २०२३ की रिपोर्ट के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को १.५ डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया गया (जो २०३० तक ही संभव), तो अगले दशकों में भारी बाढ़, सूखा, समुद्र का बढ़ता जलस्तर और खाद्यान्न संकट लाखों लोगों को विस्थापित कर देगा।
भारत की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। सेंट्रल वाटर कमीशन के अनुसार, गंगा बेसिन में २०५० तक जल की उपलब्धता २० प्रतिशत तक घट सकती है। ऐसे में पर्यावरण-संरक्षण केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।
इस संकट के मूल में जो मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण हैं, उनसे लड़ने में धर्म की विशेष भूमिका है। आधुनिकता ने मनुष्य को प्रकृति का स्वामी बना दिया, धर्म उसे पुनः प्रकृति का अंश और संरक्षक बनाने की क्षमता रखता है। सामाजिक-मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि धार्मिक-आध्यात्मिक प्रेरणा व्यवहार-परिवर्तन में सबसे प्रभावी होती है। एक अध्ययन में पाया गया, कि जो लोग प्रकृति को ‘पवित्र’ मानते हैं, वे पर्यावरण-हितैषी व्यवहार अधिक अपनाते हैं।


🔹धर्म-आधारित पर्यावरण आंदोलन : वर्तमान प्रयास-
विश्वभर में धार्मिक समुदाय पर्यावरण आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ‘इंटरफेथ रेनफारेस्ट इनिशिएटिव’ में हिंदू, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी और स्वदेशी धार्मिक नेता मिलकर वर्षावनों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। ‘ग्रीनफेथ’ संगठन दुनिया के ४० से अधिक देशों में धार्मिक समुदायों को जलवायु कार्रवाई के लिए संगठित कर रहा है।
भारत में अनेक मंदिर और धार्मिक स्थल पर्यावरण-संरक्षण के केंद्र बन रहे हैं। तिरुपति बालाजी मंदिर ने अपने १० हजार एकड़ भूमि पर वृक्षारोपण कार्यक्रम चला रखा है। केरल के गुरुवायूर मंदिर और कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर ने भी पर्यावरण-कार्यक्रम अपनाए हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश के अनेक आश्रम गंगा-सफाई अभियान में सक्रिय हैं।


🔹चुनौतियाँ और विरोधाभास-
धर्म में पर्यावरण-संरक्षण की अपार क्षमता है, पर कुछ विरोधाभास भी हैं जिन पर ईमानदारी से विचार करना होगा। कुम्भ मेले में करोड़ों श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं, किंतु इससे उत्पन्न कचरे और नदी-प्रदूषण की समस्या भी है। २०१९ के प्रयागराज कुम्भ मेले में गंगा के कुछ हिस्सों में प्रदूषण का स्तर सामान्य से कई गुना बढ़ा। अगरबत्ती, दीपक और पूजा सामग्री से वायु-प्रदूषण, मूर्ति-विसर्जन से जल-प्रदूषण — ये वे क्षेत्र हैं जहाँ धार्मिक परम्पराओं को पर्यावरण संवेदनशीलता के साथ पुनर्परिभाषित करना होगा।


🔹आगे की राह और एकीकृत दृष्टिकोण:
पर्यावरण संरक्षण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें धर्म, विज्ञान, नीति और समुदाय सभी मिलकर काम करें। धार्मिक शिक्षा में पर्यावरण पाठ्यक्रम को शामिल किया जाना चाहिए। मदरसों, मंदिर, पाठशाला, गुरुकुल और चर्च-विद्यालयों में पर्यावरण-साक्षरता अनिवार्य हो। धार्मिक उत्सवों को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए धार्मिक नेताओं को पहल करनी होगी — जैसे ईको-फ्रेंडली गणेश मूर्तियों का चलन पहले से बढ़ रहा है, यह और व्यापक होना चाहिए। धार्मिक स्थलों को ‘ग्रीन टेम्पल’, ‘ग्रीन मस्जिद’, ‘ग्रीन चर्च’ बनाने के अभियान चलाए जाने चाहिए।
भारत में धार्मिक नेताओं के पास सबसे बड़ी ‘सॉफ्ट पावर’ है — कोई भी सरकार या कॉरपोरेट इतने बड़े और निष्ठावान समुदाय तक नहीं पहुँच सकती, जितना एक धार्मिक नेता पहुँच सकता है।


🔹एक पुनः संकल्प-

चाहे हिंदू धर्म हो या इस्लाम, बौद्ध धर्म हो या ईसाई, जैन हो या सिख — सभी में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उसके संरक्षण का आदेश मौजूद है। यह कोई संयोग नहीं। जिन समाजों ने हजारों वर्षों तक एक ही भूमि पर निवास किया और उसी से जीवन पाया, उन्होंने अनुभव से जाना कि यदि प्रकृति का दोहन होता रहा, तो वे स्वयं नष्ट हो जाएंगे।
आज का मनुष्य तकनीक के मद में इतना उन्मत्त हो गया है कि उसे लगता है कि वह प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। किंतु ‘कोविड-१९’ महामारी एक कटु स्मरण था, कि प्रकृति के समक्ष मनुष्य कितना असहाय है। पर्यावरण संकट इससे भी बड़ा और धीमा, किंतु अधिक विनाशकारी खतरा है।
हमें उस ज्ञान की ओर लौटना होगा जो हमारे ऋषियों और बुद्धों ने हमें दिया। उस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की भाषा में अनूदित करना होगा और उसे नीतियों में ढालना होगा। जब करोड़ों लोगों के भीतर यह विश्वास जागे कि पृथ्वी की रक्षा ईश्वर की आज्ञा है, तो कोई भी नीति या कानून उतना प्रभावी नहीं हो सकता, जितना एक जागरूक, प्रेरित और नैतिक रूप से प्रतिबद्ध समाज।
अंततः, पर्यावरण संरक्षण केवल एक तकनीकी या राजनीतिक समस्या नहीं है — यह एक आध्यात्मिक और नैतिक संकट है। इस संकट का उत्तर उसी स्थान पर है, जहाँ से हमारी सभ्यता का प्रारंभ हुआ था — उस गहरी आंतरिक अनुभूति में, कि हम इस पृथ्वी के स्वामी नहीं, उसकी संतान हैं। ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ — यह केवल एक वैदिक श्लोक नहीं, यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे २१वीं सदी को फिर से जीना होगा, यदि इस पृथ्वी पर जीवन को बचाना है।