आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
***************************************************
मेरा पर्यावरण, मेरी जान (विश्व पर्यावरण दिवस)….
कवि नहीं मैं काव्य मरघट का, पुराना भूत हूँ,
खेत, पेड़, जंगल, वन, पहाड़ से अभिभूत हूँ।
पर्यावरण संरक्षण का रक्षक एवं एक दूत हूँ,
पेड़ों की कटाई से बेहद क्षुब्द और क्रोधित हूँ।
पृथ्वी श्रृंगार व प्रकृति हरियाली से मोहित हूँ,
पर्यावरण से छेड़छाड़ करने वालों का यमदूत हूँ।
पर्यावरण जीवित रहे इसी चिंतन का मेघदूत हूँ,
जीव-जंतुओं के प्राण पर्यावरण का वायुदूत हूँ।
भावी पीढ़ियों को ऑक्सीजन मिले, मैं भयभीत हूँ,
पीपल की छाँव, अपने प्यारे गाँव से वशीभूत हूँ।
उत्पादन की ऊँचाइयों के लिए प्रदूषण मुक्त हूँ,
वैश्विक युद्ध में पर्यावरण के दुश्मनों से कम्पित हूँ।
बम-बारूद, ड्रोन, मिसाइल प्रयोग से कुपित हूँ,
विश्व के पर्यावरण विनाशी, आतंकी प्रवृत्ति से व्यथित हूँ।
पर्यावरण संरक्षण मानक अपनाने वालों का मीत हूँ,
भारत माँ का पूत, पर्यावरण संरक्षण का सपूत हूँ।
‘आओ पेड़ लगाएँ, कार्य ये नेक महान,
भावी पीढ़ी याद करेगी, पुनर्जन्म समान’॥
परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”