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प्रकृति से ही प्रेरणा, उल्लास

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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प्रकृति ने ऐसी चाल चली,
सूखी डाली फिर से लहलहाई
हरियाली-सी छा गई,
फूल खिले रंग-बिरंगे।

खुशबू फैली चारों ओर निराली,
वह पुरवाई भी तरसाई
बागों में कलियाँ जब मुस्काईं,
फिर मन झूमे, तन हँसे।

अंग-अंग में सिहरन आए,
लहलहाती तरुणाई
रंग-बिरंगे सपनों ने डाले,
खो गई ऐसी अलसाई।

सबने जानी मदमाती, शर्माती,
मुस्काती मस्तानी वसंत ऋतु आई
आज अमराइयों में भी,
महक उठी है मंजरी सारी।

कलियाँ रास्तों में खिल-खिल कर,
बिछ गई होंगी सारी
धरती हरी चुनर ओढ़े खड़ी,
आँखों में रंगीन सपने नज़र आने लगे।

सुखद नज़ारे और फैले,
प्रकृति अपना प्यारा रंग दिखाए
कभी बाढ़ की विभीषिका लाए,
सारी पृथ्वी की छटा दिखाए।

कभी सुख लाए तो दु:ख-सा दिखाए,
प्रकृति की लीला अपरम्पार होती है
लेकिन प्रकृति के कारण ही मानव में,
नवजीवन का संचार होता।

नई इच्छाएँ, नई उमंग पास होती,
मानव जीवन में आशा का प्रकाश।
प्रकृति से ही मिलती प्रेरणा,
यही उसका अनुपम उल्लास॥