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बस एक बार सोचें

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें,
अब मन में नहीं रही ‘रोज़-डे’ की कोई बात
अब खत्म हो गई पुरानी गुलाब की बात,
अब है मन में चुनौतियाँ, मन में एक क्रोध
पीड़ा है वीरों के लिए, ना अपने लिए प्रेम रहा।
हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें…

हम बस एक बार बार सोचें, बस एक बार सोचें,
क्रोध खत्म न होता, अश्रु धार न टूटती
दुःख-दर्द दूर भागते नहीं गुलाब भी पाकर,
अब वीर सैनिक के लिए, राष्ट्र शक्ति के लिए,
उनके परिवार की पुकार, उनकी गुहार-चीत्कार।
हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें…

हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें,
उनकी जवानियाँ चली गई देश के लिए
पुलवामा में चौदह फरवरी को ही
वीरता की कहानियाँ छिप गयी,
प्रेम, प्यार, गुलाब, परिवार, देश रक्षा में उनकी जवानियाँ चली गई।
हम बस एक बार सोचें, बस एक बार सोचें…

हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें,
सूर्य, चन्द्र उपर बैठे राम-कृष्ण सब देखते रह गए
चीत्कार, पुकार, गुहार सब देव देखते रह गए
अब हम कैसे ले लें गुलाब अपने प्रिय से,
कैसे मना लूँ ‘रोज़-डे’ प्यार से, प्रेम से, मन से।
हम बस एक बार सोचें, बस एक बार सोचें…

हम एक बार सोचें, बस एक बार सोचें,
अब तो बस पुलवामा के वीर को सलाम
जो जान दे गए जवानी में,
आँखें बन्द कर टुकड़ों में खत्म हो गए
नहीं चाहिए कोई गुलाब अब हाथ में,
बस तिरंगा दे देना हाथ में।
वीर जवानों के लिए मन में सम्मान रहे, प्यार रहे,
बस एक बार सोचें, बस एक बार सोचें…॥