भागलपुर (बिहार)।
‘पारस’ पारस ही हो सकता है, दूसरा कोई पत्थर पारस नहीं हो सकता है। डॉ. तुषारकांत ने भागलपुर के एक साहित्यिक अध्याय को इस पुस्तक के माध्यम से समाहित किया है।
परमहंस स्वामी श्री आगमानंद महाराज ने करतल ध्वनि के बीच वरिष्ठ पत्रकार-लघुकथाकार पारस कुंज के व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित पुस्तक यूँ ही कोई ‘पारस’ नहीं होता’ का स्थानीय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पथ स्थित श्री गौशाला सभागार में लोकार्पण करते हुए यह बात कही। प्रतिष्ठित समालोचक साहित्यकार प्रो. (डॉ.) लखनलाल सिंह आरोही की अध्यक्षता में इस उत्सव की मुख्य अतिथि विदुषी श्रीमती कृष्णा मिश्र रहीं। विशिष्ट अतिथि रंजन कुमार, अंजनी कुमार शर्मा व डॉ. श्याम सुंदर आर्य ने भी उदगार व्यक्त किए। सुनील कुमार मिश्र, प्रभात सिंह जैन, सुरेश प्रसाद, डॉ. कुमार गौरव, विकास कुमार जैन आदि ने पुस्तक के प्रकाशन पर सम्पादक डॉ. तुषार कांत एवं इसके केन्द्र बिन्दु पारस कुंज की पूरी-भूरी प्रशंसा की। संरक्षक रामरतन चूड़ीवाला ने स्वागत भाषण दिया। तत्पश्चात् पारस कुंज ने फाइलों में दबे पड़े पत्रों को डॉ. कांत ने किस प्रकार एकत्र कर सम्पादन किया, की रोचक जानकारी दी।
विकास झुनझुनवाला एवं दिव्या गुप्ता के संयुक्त संचालन में हुए इस आयोजन का डॉ. राजेश गोयल के धन्यवाद ज्ञापन से समापन हुआ।