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भारत का दिव्य पुत्र

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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एक ही कार्य हाथ में लो, उसे करके दिखलाओ,
कष्ट चाहे जितने भी आए, देश का मान न मिटाओ।

मन किया शिव व्रत जन्म लिया, बालक देवत्व।
नाम नरेंद्र दत्त था, माँ का था वह बड़ा दुलारा।

भटकते-भटकते मिल ही गए गुरु महान,
इंतजार में बैठे रामकृष्ण परमहंस काली के दरबार।

गुरु दिए भरपूर ज्ञान, करना है तुम्हें महान काम,
गुरु की आज्ञा, ठान लिया करना है विशेष काम।

पग-पग पर आया भारी कष्ट, विचलित ना हुआ प्रतापी,
विद्वानों बीच बताया, है भारत के गौरव की बात।

ज्ञान-विज्ञान की बात करेंगे, भारत की गाथा को समझाएंगे,
वेशभूषा थी सन्यासी, भारी पड़ा वह सब पर ज्ञान।

हिंदुस्तानी बात बताता, सबको ज्ञान का मार्ग दिखाया,
दुनिया को सत्य ज्ञान दिया, ज्ञान विज्ञान का मार्ग दिखाया।

देवों की संस्कृति बताई, शिकागो में खूब हुआ प्रचार,
ऋषि-मुनि भी करते ध्यान, लेते सदा सब उनका नाम।

३९ साल की उम्र तक कभी ना किया विश्राम,
मठ का किया निर्माण, सपना उनका हुआ साकार।

रोम-रोम सदा पुलकित होता नाम जपकर सन्यासी का,
वह थे प्रतापी विवेकानंद स्वामी भारत की संतान।

भारत गौरवान्वित होता, जन्म लिया भारत की मिट्टी में,
जब तक यह धरती रहेगी, विश्व सदा गुणगान करेगा॥