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माओवादी मुक्ति से शांति एवं संतुलन की नई संभावनाएँ

ललित गर्ग
दिल्ली
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भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ हमेशा से बहुआयामी रही हैं। इन चुनौतियों में नक्सलवाद या माओवादी हिंसा एक ऐसी समस्या रही, जिसने दशकों तक देश की आंतरिक शांति, विकास और सुशासन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों ने न केवल विकास को अवरुद्ध किया, बल्कि हजारों निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की जान भी ली, पर जब बस्तर जैसे माओवादी गढ़ से २५ लाख के इनामी सरगना पापा राव का साथियों सहित आत्मसमर्पण करना एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आया है, तब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत माओवादी मुक्ति की ऐतिहासिक दहलीज पर खड़ा है। नक्सलवाद की जड़ें सामाजिक-आर्थिक असमानता, उपेक्षा और शोषण में रही हैं, लेकिन समय के साथ यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्यों से भटककर एक हिंसक और विध्वंसकारी विचारधारा में बदल गया। माओवादी संगठन न केवल विकास कार्यों में बाधा डालते रहे, बल्कि उन्होंने स्थानीय लोगों को भय और हिंसा के माध्यम से नियंत्रित किया। विद्यालय, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र जैसे बुनियादी ढांचे को नष्ट करना उनकी रणनीति का हिस्सा बन गया था। इससे यह स्पष्ट हो गया, कि यह आंदोलन अब जनहित का नहीं, बल्कि सत्ता और नियंत्रण का माध्यम बन चुका है।
भारत सरकार द्वारा ३१ मार्च २०२६ तक देश को नक्सलवाद-माओवाद से मुक्त करने का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह अब लगभग अपनी अंतिम अवस्था में पहुंचता दिखाई दे रहा है। पिछले एक दशक में १० हजार से अधिक माओवादियों के समर्पण, सुरक्षा बलों की आक्रामक एवं रणनीतिक कार्रवाई तथा प्रभावित क्षेत्रों में तेज़ी से हुए विकास कार्यों ने माओवादी आंदोलन की जड़ों को कमजोर कर दिया है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में माओवादी हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। विशेष रूप से शीर्ष नेतृत्व के समर्पण ने संगठन को नेतृत्वहीन कर दिया, जिससे माओवादी संरचना भीतर से कमजोर पड़ गई। इस सफलता के पीछे सरकार की बहुआयामी रणनीति रही, जिसमें केवल सैन्य-पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि विकास, पुनर्वास और प्रशासनिक पहुंच को भी समान महत्व दिया गया। रेड कॉरिडोर क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण, मोबाइल टावरों के माध्यम से ४जी नेटवर्क का विस्तार, शालाओं और आईटीआई संस्थानों की स्थापना ने इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। वहीं ‘फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशनों’ की रणनीति के माध्यम से सुरक्षा बलों ने माओवादियों के गढ़ों में घुसकर निर्णायक कार्रवाई की। समर्पण करने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता, रोजगार और समाज में पुनर्स्थापना की व्यवस्था ने भी माओवादी वर्ग को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया। यह समन्वित रणनीति, दूरदर्शिता और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है, कि देश आज नक्सलवाद के अंत के ऐतिहासिक चरण के निकट खड़ा दिखाई दे रहा है।
निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी और दृढ़ रणनीति अपनाई। गृहमंत्री अमित शाह की सूझ-बूझ और स्पष्ट दृष्टिकोण ने इस अभियान को एक नई दिशा दी। सरकार ने एक ओर जहां सुरक्षा बलों को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और संसाधनों से सशक्त किया, वहीं दूसरी ओर विकास योजनाओं को भी गति दी। ‘सुरक्षा और विकास’ के इस दोहरे दृष्टिकोण ने माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन की नींव रखी।
बस्तर, जो कभी माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहाँ आज पापा राव जैसे शीर्ष माओवादी नेता का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि माओवादी संगठन अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि विचारधारा के पतन का प्रतीक है।
अब माओवादी मुक्ति का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि देश के उन क्षेत्रों में शांति और स्थिरता स्थापित होगी, जो लम्बे समय से हिंसा की चपेट में रहे हैं। जब बंदूकें खामोश होंगी, तब विकास की आवाज बुलंद होगी। सड़कें बनेंगी, विद्यालय खुलेंगे, अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ेंगी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का संचार होगा। आदिवासी और ग्रामीण समुदाय, जो अब तक भय और असुरक्षा में जी रहे थे, अब अपने अधिकारों और अवसरों का पूर्ण लाभ उठा सकेंगे, साथ ही माओवादी हिंसा के समाप्त होने से भारत की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी। जब देश के भीतर शांति होगी, तब ही बाहरी खतरों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है।
नक्सलवाद जैसी समस्याएं अक्सर विदेशी शक्तियों और असामाजिक तत्वों को भी अवसर देती हैं, जिन्हें समाप्त करना राष्ट्रीय हित में अत्यंत आवश्यक है। इस दृष्टि से माओवादी मुक्ति न केवल आंतरिक, बल्कि सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

सरकार के लिए यह अवसर है कि वह इन क्षेत्रों में सुशासन की मजबूत नींव रखे। पंचायतों को सशक्त किया जाए, स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहित किया जाए और जनभागीदारी को बढ़ावा दिया जाए। यह भी आवश्यक है, कि माओवादी विचारधारा के प्रभाव को वैचारिक स्तर पर भी चुनौती दी जाए। शिक्षा, जागरूकता और संवाद के माध्यम से लोगों को यह समझाना होगा, कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। लोकतंत्र में परिवर्तन का मार्ग शांतिपूर्ण और संवैधानिक होता है। इस दिशा में समाज, सरकार और नागरिक संगठनों को मिलकर प्रयास करना होगा। माओवादी मुक्ति के इस दौर में यह भी ध्यान रखना होगा कि जिन कारणों से यह समस्या उत्पन्न हुई थी, वे दोबारा न उभरें। सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और विकास की समावेशी नीति को प्राथमिकता देना आवश्यक है। यह भारत के लोकतंत्र, विकास और सुशासन की जीत है। यह उस विश्वास का प्रतीक है कि भारत अपने आंतरिक संघर्षों को शांतिपूर्ण और निर्णायक ढंग से सुलझाने में सक्षम है। अब समय है कि इस उपलब्धि को स्थायी बनाया जाए और देश के हर कोने में शांति, समृद्धि और संतुलन का वातावरण स्थापित किया जाए।