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यूजीसी:देश पराया

सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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मेरी सब्र की उम्मीद का पैमाना, धीरे-धीरे टूट रहा है,
नक्कारखाने में आवाज़ तूती की, कोई भी न सुन रहा है
नहीं जरूरत देश को मेरी, ऐसा मुझको लग रहा है,
चला जाऊंगा परदेस एक दिन, ख्याल दिल में उठ रहा है।

सवर्ण होना गुनाह है मेरा, मुझे देश समझा रहा है,
अज्ञानी को दे आरक्षण, मेरा भविष्य बिगाड़ रहा है
टूट गया है अब मन मेरा, देश पराया लग रहा है,
भारत की माटी से मेरा, दाना-पानी उठ रहा है।

बचपन से लेकर आज तलक, कानून मुझको हरा रहा है,
नहीं किया जो जुर्म अभी तक, उसकी सजा सुना रहा है
कदम-कदम मेरी मेहनत पर, पानी इतना फेर रहा है,
थक-हार सवर्ण विद्यार्थी, अनचाहे फाँसी झूल रहा है।

मेधावी होकर आरक्षण की, चक्की में ऐसा पिस रहा है,
फर्स्ट डिवीजन नम्बर लाकर, थर्ड से मुँह की खा रहा है
बहुत हो गई सहनशीलता, भेदभाव से हार गया है,
तुम्हारा बेटा नई आस में, देश छोड़कर जा रहा है।

अब बेटे को कसूर न देना, बुढ़ापे में छोड़ जा रहा है,
विवश किया है सबने मिलकर, सवर्ण कीमत चुका रहा है।
परदेस जाने की देख नौबत, दिल बहुत ही कांप रहा है,
विद्वता का कर्ज चुकाने बेटा, देहरी छोड़कर जा रहा है॥