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‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’ विषय पर हुआ महती विमर्श

◾अपने संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए लोक से जुड़ना जरूरी-डॉ. पांडेय

सागर (मप्र)।

बाल साहित्य शोध सृजनपीठ (साहित्य अकादमी, मप्र शासन) द्वारा महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’ (परंपरा कथा और काव्य का जीवंत संग़म) विषय पर महती विमर्श और काव्य पाठ का आयोजन वरदान सभागार (सिविल लाइंस, सागर) में किया गया। पीठ की निदेशक व प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका डॉ. मीनू पाण्डेय ‘नयन’ की विशिष्ट उपस्थिति में इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम के स्थानीय संयोजक श्यामलम् संस्था के अध्यक्ष उमाकान्त मिश्र रहे।
आयोजन में हिन्दी साहित्य भारती के अध्यक्ष अम्बिका यादव, साहित्यकार आर.के. तिवारी, श्रुतिमुद्रा समिति की अध्यक्ष डॉ. कविता शुक्ला एवं हिन्दी साहित्य सृजन संघ सागर की अध्यक्ष सुनीला सराफ सह-संयोजक रहीं। इस अवसर पर निदेशक ‘नयन’ ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कहा, कि लोकध्वनि जब बाल ध्वनि के रुप में गूंजने लगेगी तो बालकों का नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित हो जाएगा। अपने संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए लोक से जुड़ना जरूरी है।
प्रसिद्ध लेखक घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ (भोपाल) ने कहा कि सोशल मीडिया का बढ़ता हुआ प्रभाव हमारी भाषा, भूषा और भोजन को दूषित कर रहा है। इसे हम लोकध्वनि के पुनः स्थापन द्वारा ही कम कर सकते हैं।
वरिष्ठ लेखक गोकुल सोनी (भोपाल) ने कहा, कि लोक ध्वनि से बाल ध्वनि पर समाज कितना ध्यान देता था, यह इससे जाहिर होता है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद में बच्चों की शिक्षा और संस्कार संबंधित सूक्त दिए हुए हैं।
इंक मीडिया के निदेशक व समालोचक डाॅ. आशीष द्विवेदी ने कहा, कि बच्चों में होने वाले डिजिटल अपराध रोकने के लिए माता-पिता को स्वयं इस आभासी दुनिया से दूरी बनाए रखनी होगी और बच्चों से संवाद स्थापित करना होगा। बाल मनोविज्ञान को समझे बगैर बाल साहित्य को गढ़ना संभव नहीं है। हमारे आसपास की लोक ध्वनियाँ ऐसी निर्झरियाँ हैं, जिनमें भारत के प्राण तत्व बसते हैं। उन्हें सहेज कर बाल मन तक स्थानांतरित करना ही बाल साहित्य का कार्य है।
डॉ. कविता शुक्ला ने कहा, कि भारतीय संस्कृति का विशेष महत्व है। मंत्रोच्चार, ॐ नाद इसके उदाहरण हैं। इन्हीं ध्वनियों से बाल ध्वनियों का निर्माण होता है। आयोजन में डॉ. वर्षा तिवारी ने पुरानी परंपराओं से सीख लेने की आवश्यकता पर ध्यान आकृष्ट कराया।
प्रारम्भ में कवि मुकेश तिवारी ने सरस्वती वंदना की। संयोजक उमाकान्त मिश्र ने कार्यक्रम का परिचय दिया। इस अवसर पर आयोजक संस्थाओं की ओर से अतिथि वक्ताओं, कवियों और श्रोताओं का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया गया, साथ ही कवियों को शाम्भवी क्रिएटिव फाउंडेशन (दिल्ली) ने भी स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया।
कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्ध नागरिकों तथा साहित्यप्रेमी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही, जिनमें टी.आर. त्रिपाठी, हरि सिंह ठाकुर, अभिनंदन दीक्षित, रमेश चौकसे, डॉ. नीलिमा पिंपलापुरे, डॉ सुश्री शरद सिंह आदि उल्लेखनीय हैं।
इस प्रथम सत्र का संचालन सुनीला सराफ ने किया। आभार प्रदर्शन निदेशक डॉ. पांडेय द्वारा किया गया।


🔹रचना पाठ से किया प्रभावित-
कार्यक्रम में बाल कविताओं पर केंद्रित द्वितीय सत्र में डाॅ. नलिन निर्मल, प्रभात कटारे, प्रतिभा द्विवेदी ‘मुस्कान’, दीपाली गुरु, भानु प्रताप यादव एवं वरिष्ठ कवि वृंदावन राय ‘सरल’ आदि ने रचना पाठ कर प्रभावित किया। इस सत्र का संचालन कवि अम्बिका प्रसाद यादव ने किया।