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सफेद गुलाब

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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आखिरकार उसने दुकान में फ्लेक्स टांग ही दिया। उसका फार्मूला सही बैठा। लड़के-लड़कियों की भीड़ लगना शुरू हो गई। पहले वो फ्लेक्स को पढ़ते, कुछ सोचते, फिर फूल खरीदते। जैसा उसने सोचा था, वैसा ही हुआ। उसे दम मारने की फुरसत नहीं मिल रही थी। दस-पंद्रह वाली गुलाब की कली वह पच्चीस रुपए में बेच रहा था। कोई मोल-भाव नहीं। एक भाव ! थोड़ी-थोड़ी देर में फ्लेक्स को पढ़ते लड़के-लड़कियों को देखकर उसके मन में खुशी की लहर दौड़ पड़ती-
‘वैलेंटाइन स्पेशल’
प्रेम की गहराई बताने के लिए-लाल गुलाब।
प्रेम में अपनापन जताने की लिए-गुलाबी गुलाब।
प्रेम के रिश्ते को आजीवन चलाने के लिए-सफेद गुलाब।
प्रेम पर गर्व करने के लिए-नारंगी गुलाब।

शाम तक सारा माल बिक गया। सिवाय सफेद गुलाब के। फ्लेक्स को उतार कर उसको घड़ी करते हुए वह सोच रहा था… ‘अगली बार वैलेंटाइन-डे पर सफेद गुलाब नहीं लाऊँगा!’