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सर्दियों की सुबह

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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सुबह सर्दियों की,
थोड़ी अलसाई-सी
नरम धूप की चादर ओढ़े,
ज्यों नींद में मुस्काई-सी।

कोहरे के आगोश में शहर,
छाई है धुंध-सी
ओस की बूँदें फूलों पर,
चमकती हीरे-सी।

रजाई से झांकती आँखें,
सपनों में उलझी-सी
सर्द हवा के झोंके,
छेड़ें कहानी कुछ सिहरन-सी।

चिड़ियों की हल्की चहचहाहट,
देती सुबह की दस्तक-सी
गलियों में कदमों की आहट जैसे,
ठंड से करती समझौता-सी।

छत पर फैली धूप,
माँ के नर्म आँचल-सी।
सर्दियों की प्यारी सुबह,
जैसे हो नटखट सहेली-सी॥