डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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वृक्ष-पात से नीर झरे,
धुंध ही धुंध दिखाई पड़े
हाड़ कम्पाती ठंडक आई,
सोया सूरज ओढ़ रजाई।
बोला अब ना निकलूंगा,
अब करना मुझे विश्राम
चलते-चलते थक जाता हूँ,
पहर और आठों याम।
सुन माँ अदिती दौड़ी आई,
प्यार से कुछ बातें समझाई।
उठ जा बेटा फेंक रजाई,
समझ जरा तू पीड़ पराई।
देख धरा पर कैसी हलचल,
जीव-जंतु सब हो रहे विकल
पेड़-पौधे भी खामोश खड़े,
फूल-बगिया कुम्हलाए पड़े।
ना भौरों की गुन-गुन है,
ना खग कलरव पड़े सुनाई।
बर्फ की चादर फैली है,
काम काज में सुस्ती छाई।
फुटपाथ का देख नजारा,
उनका होगा कौन सहारा
पेट-पीठ मिलकर बने एक,
बिलख रहे रोटी को पेट।
रात को पसरी खामोशी,
वस्त्र हीन तन कांप रहा
श्वान मनुज का सच्चा साथी,
मन की बातें भांप रहा।
साथ निभाने को वह तत्पर,
सोया उनके साथ सिमटकर।
देख दृश्य दिल रोता है,
मानव क्यों और कैसे जीता है…?