डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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‘गीत-संगीत की अमिट पहचान’ (स्व. आशा भोसले विशेष)…
भारतीय संगीत आकाश का एक तेजस्वी नक्षत्र अस्त हो गया। आशा भोसले के निधन के साथ ही वह स्वर-युग समाप्त हो गया, जिसने दशकों तक श्रोताओं के हृदयों को मधुरता, चंचलता और भावों की अनंत गहराई से आलोकित किया।
सन् १९३३ में जन्मी आशा भोसले ने अपने जीवन के ९२ वर्षों में संगीत को केवल साधा नहीं, बल्कि उसे जीवन का उत्सव बना दिया। उनकी आवाज़ में एक अद्भुत लचीलापन था—जहाँ एक ओर शास्त्रीयता की गंभीरता थी, वहीं आधुनिकता की चपलता भी।
वे महान गायिका लता मंगेशकर की सहोदर थीं, और दोनों बहनों ने मिलकर भारतीय संगीत को वह ऊँचाई प्रदान की, जिसे युगों तक स्मरण किया जाएगा। यदि लता जी स्वर की निर्मल गंगा थीं, तो आशा जी उसी गंगा की चंचल लहरें, जो हर रूप में मन को छू जाती हैं।
उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। सीमित अवसरों और चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। ओ. पी. नैय्यर और आर. डी. बर्मन जैसे महान संगीतकारों के साथ उनकी जुगलबंदी ने हिंदी फिल्म संगीत को स्वर्णिम युग प्रदान किया।
आशा जी की गायकी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी। उन्होंने ग़ज़ल, भजन, लोकगीत, पॉप और फिल्मी गीतों में समान अधिकार से अपनी छाप छोड़ी। ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘दिल चीज़ क्या है’, ‘इन आँखों की मस्ती’ जैसे अनगिनत गीत आज भी श्रोताओं के हृदय में जीवित हैं।
उनकी उपलब्धियाँ भी उतनी ही विराट हैं। उन्हें दादासाहेब फालके सम्मान, पदम् विभूषण सहित अनेक फिल्म फेयर पुरस्कार, राष्ट्रीय पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से भी सम्मानित किया गया। उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी अंकित है, जो उनके विशाल गीत-संग्रह का प्रमाण है।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनके सुर अमर हैं। उनका संगीत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं—वे स्वयं एक युग थीं, एक परंपरा थीं, एक जीवंत धरोहर थीं।