भारत में भाषा का मसला

hindibhashaa

विजयलक्ष्‍मी जैन

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कुछ विद्वतजनों की मान्यता है कि हिन्दी भाषा को भारत में देशव्यापी भाषा बनाने का श्रेय हिन्दी फिल्मों को जाता है। फिल्मी दुनिया की अधिकांशतः अतिभौतिकता,अनैतिकता और भारत में पाश्चात्य लंपटता के विस्तार में अग्रणी भूमिका होने के बावजूद कुछ हद तक इस विचार को स्वीकार किया जा सकता है कि फिल्मों के माध्यम से हिन्दी का संपूर्ण भारत में प्रसार हुआ है। हिन्दी फिल्में पूरे देश में और अब तो विदेशों में भी खूब देखी जा रही हैं। हिन्दी फिल्मों के गाने देश-विदेश सभी जगह लोकप्रिय हैं। दक्षिण भारत में हिन्दी भले ही ना चलती हो पर हिन्दी गाने खूब चलते हैं,पर फिल्म जगत में भी परिदृश्य अब कुछ बदला हुआ है। एक समय था जब हिन्दी फिल्मों के निर्माता,निर्देशक,अभिनेता,अभिनेत्री,गीतकार, संगीतकार सब भारतीय होते थे। जिनके दिल में भारत था और वे हिन्दी की भी अच्छी जानकारी रखते थे,लेकिन अब वह दौर नहीं रहा। आज निर्माता,निर्देशक,अभिनेता, अभिनेत्री,गीतकार,संगीतकार ज्यादातर भारतीय न होकर `इंडियन` हैं; कहने को भारतीय लेकिन विदेशों में पले-बढ़े-पढ़े,उनके दिल में भारत नहीं,अमेरिका बसता है।
हिन्दी फिल्मों में हिन्दी संवाद बोलना पड़ता है,इस कारण वह कुछ हद तक हिन्दी समझ और बोल तो लेते हैं,लेकिन देवनागरी लिपि पढ़ने की योग्यता उनमें नहीं है। देश,भाषा, लिपि के प्रति हमारी चिंताओं से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। उन्हें सरोकार है तो सिर्फ अपनी तगड़ी कमाई से। उन्हें हिन्दी फिल्म की कहानी रोमन लिपि में लिखकर दी जाती है,तब वे पढ़ पाते हैं। उन्हें हिन्दी के संवाद रोमन लिपि में लिख कर दिए जाते हैं,तब वे समझ और बोल पाते हैं। वर्तमान में जो हिन्दी फिल्में बनाई जा रही हैं वे भारत को ध्यान में रखकर नहीं,विदेशी संस्कृति,विदेशी दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्द और वाक्य,संवाद और गीतों में धड़ल्ले से घुसाए जा रहे हैं। हमारी युवा पीढ़ी इस घालमेल को बड़े प्रेम से ग्रहण कर रही है,क्योंकि ये फिल्में युवाओं के मनमौजी, उच्छृंखल,अनैतिक,लंपट आचरण के पक्ष में सामाजिक वातावरण का निर्माण करती हैं। कहना ना होगा कि हमारी युवा पीढ़ी के आदर्श फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्री हैं। वे उनके जैसे ही बनना चाहते हैं,उनके जैसे ही जीना चाहते हैं और उनके जैसे ही मरना भी चाहते हैं। फिल्मी लोगों की तरह ही हमारे देश के युवा वर्ग को अपने देश,अपनी भाषा,अपनी लिपि की कोई चिंता नहीं है। कुल मिलाकर हिन्दी फिल्में अब हिन्दी की नहीं,अंग्रेजी की वाहक बनती जा रही हैं। इससे भी आगे बढ़कर तथ्य यह है कि,देश में अब हिंदी फिल्मों के दर्शक कम हो रहे हैं और विदेशी फिल्मों के दर्शक बढ़ते जा रहे हैं। हिन्दी फिल्मों की तुलना में विदेशी फिल्में कमाई भी अधिक कर रही हैं। यही हाल संचार के अन्य माध्यमों यथा दूरदर्शन,समाचार-पत्र,पत्रिका,उपन्यास आदि के क्षेत्र में भी है,क्योंकि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित हमारा युवा दिल से अंग्रेजी के करीब है। अंग्रेजी में और अंग्रेजी वालों से व्यवहार करते हुए वह बहुत आत्मविश्वस्त रहता है। भारतीय भाषाओं में और भारतीय भाषा भाषियों से व्यवहार करते हुए उसे हीनताबोध सताता है,लज्जा आती है। हम हिंदी प्रेमियों के पास इस हीनताबोध का कोई उपचार है ?
( सौजन्य-वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई )

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