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अपनों को भूलो मत

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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हद से ज्यादा फूलो मत तुम,
अपनों को तुम भूलो मत रे
कौन कहे कब किसकी शामत,
कौन सलामत क्या समझो रे।

कुछ लम्हों का दुर्लभ जीवन,
अपनों को तुम खोओ मत रे
हॅंसी-खुशी बाॅंटो मुस्कानें,
रिश्ते गायब मत करना रे।

सब मिल जीओ जीत प्रगति पथ,
दिलदार बनो मत टूटो रे
डगर राह कठिनाई बाधित,
अपने साथ खड़े दिल जीतो रे।

मददगार बन हमदम गुलशन,
हर कशिश इश्क बन जीओ रे
सजे आशियाना अपनों की,
रिमझिम सावन बन बरसो रे।

कौन कहाँ कब किस हालत में,
हार जीत किसे क्या समझो रे
खलक चबेना वक्त इम्तिहाँ,
पा जीत क्षणिक मत फूलो रे।

सौभाग्य मनुज अपनों का सुख,
अब साथ छूटे क्या समझो रे
परहित सतनामी मेहनतकश,
देशार्थ सार्थ बन जी लो रे।

आपद संकट तूफान विकट,
जब साथ मिले अपनों का रे
मझधार फॅंसे नाविक बनकर,
पतवार स्वयं मत खोओ रे।

मानो खाए जख़्म दर्द गम,
फिर भी अपनों मत तोड़ो रे
रखो दया संवेदन दिल में,
सुख-दु:ख खुशियाँ गम जी लो रे।

इतराते क्यों क्षणिक विजय पथ,
मद मोह कोप मत जीओ रे
कालचक्र जब बदले करवट,
सब ध्वस्त अकेले समझो रे।

अपनों का संजीवन जीवन,
सब साथ-साथ हित समझो रे
तजो स्वार्थ परमार्थ सुफल पा,
अनुराग शान्ति यश पा लो रे।

साथ हाथ मिल सजा स्वप्न हिय,
अरुणिम प्रभात चहुँ चमको रे।
मानवता नैतिक मूल्यक रथ,
आरोह स्वर्ग सुख दमको रे॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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