पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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वंश चलाने के नाम पर सदियों से बेटों की चाहत रखने वाली दुनिया की सोच अब बदल रही है। पहले लोगों ने बेटियों को दुनिया में आने से रोका, वहीं अब बेटों से ज्यादा बेटियों की चाहत बढ़ रही है। अब वह बोझ की तरह नहीं, वरन् वरदान समझी जा रही है।
ताजा शोध में यह मालूम हुआ है कि सिर्फ चीन और भारत जैसे विकासशील देशों में बेटों की प्राथमिकता में कमी आई है, साथ ही यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी माता-पिता बेटी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारत में नेशनल फेमिली हेल्थ के सर्वे अनुसार बेटों की चाहत का आंकड़ा १९९९ में ३३ फीसदी से गिरकर अब १५ फीसदी पर आ गया है।
शहरी क्षेत्रों में एक बच्चा और वह भी बेटी का चलन काफी बढ़ा है। हालांकि, भारत और चीन जैसे देशों में लिंग का अनुपात अभी भी असंतुलित है। चीन में यह अनुपात १ हजार में ११७ के उच्चतम स्तर से गिर कर २०२३ में १११ हो गया है, तो इस वर्ष भारत में यह दर १ हजार में १०७ थी, जो २०१० में १०९ थी। इससे स्पष्ट है कि लिंग का अनुपात धीरे-धीरे प्राकृतिक औसत की ओर लौट रहा है।
सामाजिक मीडिया पर प्रसारित होते लिंग आधारित वीडियो और डिसअप्वायंटमेंट के बढ़ते मामले इस सामाजिक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। इसके अलावा ४४ देशों में गैलप इंटरनेशनल के अध्ययन में ६५ फीसदी लोगों ने कहा कि उनके लिए लिंग कोई मायने नहीं रखता है। यह समाज के लिंग निष्पक्षता की ओर बढ़ते रुख का संकेत है।
दक्षिण कोरिया, जापान, फिनलैंड, चेकगणराज्य और पुर्तगाल में भी अब बेटियों को प्राथमिकता दी जा रही है। ये बेटियों के लिए बदलती सोच का ही नतीजा है कि गोद लेने में लड़कियाँ अब पहली पसंद बनती जा रही हैं। यह सुखद बदलाव है।
संयुक्त राष्ट्र की चाइल्ड एडॉप्शन रिपोर्ट के अनुसार ३९ देशों के उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक गोद ली गयी १०० लड़कियों के मुकाबले लड़के ८५ ही गोद लिए गए। हमारे देश भारत में भी यही चलन दिखा। रिपोर्ट के अनुसार २०२३-२४ में २३०२ लड़कियाँ और १७२७ लड़के गोद लिए गए। अर्थात् ३३ प्रतिशत लड़कियाँ ज्यादा गोद ली गईं।
आँकड़ों के अनुसार विश्व में १० वर्ष में लिंग के अनुपात में निरंतर सुधार हुआ है। दुनिया में प्रति १०० महिला के सामने १०२ पुरुष, जबकि जन्म के समय १०५ का अनुपात है। इसका अर्थ है कि जन्म के समय लड़के कुछ ज्यादा पैदा होते हैं, परंतु आगे चल कर यह अनुपात महिलाओं की ओर झुक जाता है, क्योंकि महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों से ज्यादा होती है। भारत में १ हजार पुरुषों में ९४३ महिलाओं का अनुपात है, जो प्राकृतिक औसत के आसपास है।
१९८० के दशक में अल्ट्रासाउंड ने दुनिया की जनसंख्या का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया था।इकॉनामिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार १९८० से अब तक करीब ५ करोड़ बेटियों को पैदा ही नहीं होने दिया गया। वर्ष २००० में यह संकट अपने चरम पर था, जब प्राकृतिक औसत से १७ लाख लड़के ज्यादा पैदा हुए थे। अब यह अंतर लगभग २ लाख के आसपास है।
लिंग असंतुलन में आई तेज गिरावट का अर्थ है कि २००१ से अब तक ७० लाख लड़कियों को बचाया जा चुका है। और यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।
भारत सरकार ने २०२५ के बजट में लिंग बजट को बढ़ा कर ४.४९ लाख करोड़ कर दिया। यह पिछले वर्ष की अपेक्षा ३७.५ प्रतिशत ज्यादा है, जो बेटियों की सुरक्षा और शिक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
शोध और सामाजिक अनुभव बताते हैं कि बेटियाँ माता-पिता के साथ भावनात्मक रूप से ज्यादा जुड़ी रहती हैं। इसलिए, वह देखभाल अच्छी तरह करती हैं।
अब महिलाएँ चूँकि, कार्यशील और अपने पैरों पर खड़ी होती हैं इसलिए वह आर्थिक रूप से फैसले लेने के लिए अपेक्षाकृत स्वतंत्र होती हैं।
कुरीतियों में कमी यानी दहेज प्रथा में कमी आने के कारण भी बेटी को अब बोझ समझने वाली मानसिकता में कमी आती जा रही है। “वंश बेटे ही चलाएंगें” इस सोच में भी कमी आ रही है।
खेल, राजनीति, विज्ञान, अंतरिक्ष एवं कॉर्पोरेट कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ बेटियों ने अपना परचम ना फहराया हो।
कुल मिलाकर पूरे विश्व के लिए लिंग का अनुपात सामान्य होना एक सुखद संदेश है।