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अमन-शांति का अलग मजा

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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छोड़ पाशविकता ये सोचो अमन-शांति का अलग मज़ा है।
हो अशान्ति साम्राज्य जहाँ वो जीवन लगता एक सज़ा है॥

विश्व लगे उपवन के जैसा है महक उठे कोना- कोना,
खुशियों के फिर उठें बवंडर कहीं न हो रोना- धोना।
उठें न मज़हब की दीवारें सारे झगड़ों की जो वज़ह है,
हो अशान्ति साम्राज्य…॥

मानव की मस्तिष्क ग्रंथियाँ क्या-क्या ये उत्पात हैं करती,
बना-बना आयुध विचित्र ये लोगों के प्राणों को हरती।
बहता लहू नदी के जैसे न इससे कोई बड़ी कज़ा है,
हो अशान्ति साम्राज्य…॥

कितना अच्छा होता ये जग एक ध्वजा नीचे आ जाता,
बिखरी होती खुशी हर तरफ सारा जन जीवन मुस्काता।
वैमनस्य आपस का भूलें ईश्वर की भी यही रज़ा है
हो अशान्ति साम्राज्य…॥

बड़ी निराली दुनिया होती प्यार अगर आपस में रहता,
चारों ओर बहारें रहती विश्व शांति का झरना बहता।
अगर स्वप्न सच्चा हो जाये सारा जीवन ही खुशनुमा है,
हो अशान्ति साम्राज्य…॥

छोड़ पाशविकता ये सोचो अमन शांति का अलग मज़ा है।
हो अशान्ति साम्राज्य जहांँ वो जीवन लगता एक सज़ा है॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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