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अहिंसाग्राम

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“दादी, आज कौन-सी कहानी या किस्सा सुना रही हो ?” पोते ने कहा।” आपके पास तो सूचनाओं का भण्डार होता है।”
“हाँ, आज तुझे सुना रही हूँ एक बड़ी अच्छी खबर। एक है अहिंसाग्राम।”
दादी की बात पूरी भी नहीं हुई थी, कि पोते ने बीच में टोका- “अहिंसा नाम तो सुना था। कोई अहिंसाग्राम नाम का गाँव भी है, यह पहली बार सुन रहा हूँ। सारी बात बताओ।” पोता बोला।
“सुन, अहिंसाग्राम मध्यप्रदेश के रतलाम में है। वहाँ एक अम्मा ने १०० परिवारों और उनकी अगली पीढ़ी का भविष्य बदल दिया।”
पोता-“क्या नाम है उन अम्मा का ?”
दादी-“उनका नाम है तेज कुंवर काश्यप। उन्होंने ३५ जातियों से जुड़े १०० परिवारों की दशा और दिशा ऐसी बदली कि आज यह सारे परिवारों की अम्मा बन गई हैं। यहाँ उन्हें ‘अम्मा जी’ कहकर ही बुलाया जाता है।”
पोता-“कैसे बदली ? ऐसा क्या किया उन्होंने ?”
दादी-“करीब २ दशक पहले इन परिवारों को स्लम एरिया से निकालकर अम्मा द्वारा इन्हें अहिंसा ग्राम में बसाया गया था। यहाँ उन्हें नि:शुल्क आवास के साथ ही रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ऐसे संस्कार दिए गए कि इन परिवारों की अगली पीढ़ी आत्मनिर्भर हो रही है।”
पोता- “यह तो उन्होंने बड़ा अच्छा काम किया, मगर उन्होंने कहाँ-कहाँ से लोगों को वहाँ लाकर बसाया ?”
दादी- “अम्मा ने इन परिवारों का चयन रतलाम के ही एरिया से किया था। बस उनकी एक ही शर्त थी।”
“क्या ?” पोते की उत्सुकता बढ़ चली थी।
“शर्त सिर्फ एक थी कि अहिंसाग्राम में मांसाहार और नशा बिल्कुल नहीं चलेगा।” दादी ने कहा।
“यह अच्छा किया। पेट को कब्रिस्तान बनाने का क्या फायदा। और आपने मुझे कितने किस्से सुनाए हैं कि आदमी शराब पीकर कितना हंगामा करते हैं। अपनी औरतों की पीटते हैं।” पोते ने कहा।” लेकिन उनका खर्च कौन चलाता है ?”
“हाँ, वही बता रही हूँ। जिन परिवारों को लाया गया, उनके पुरुष तो पहले ही छोटा-मोटा काम करते थे। महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का काम अम्मा तेज कुंवर काश्यप ने किया। पापड़ बनाने से लेकर सिलाई, बाइंडिंग, बैग निर्माण का प्रशिक्षण देकर उन्हें इस लायक बनाया कि वे प्रतिमाह १० से १५ हजार ₹ कमा सकें।”
“तो क्या अम्मा तेजकुंवर अकेली सबको इतना कुछ सिखा पाती हैं ?” पोते ने पूछा।
” हाँ, पहले अम्मा रोज खुद प्रशिक्षण देने जाती थीं। अब उम्र अधिक हो गई है, इसलिए सप्ताह में किसी १ दिन जाने के अलावा हर तीज-त्यौहार पर इन परिवारों के बीच आकर त्यौहार मनाती हैं।”
“तो क्या सारे लोग एक हाॅल कमरे में एकसाथ रहते हैं ?” पोते ने पूछा।
“नहीं बेटा! कुल १०० आवास घर हैं। हर परिवार को आवास में २ कमरे लैट्रिन, बाथरुम और किचन यहाँ रहने वालों को नि:शुल्क दिए गए हैं।”
“तो खर्च कैसे चलता है दादी ?” पोता थोड़ा बेचैन होकर बोला।
दादी-“तुझे बताया था ना कि अहिंसाग्राम में ही १५०० वर्ग फुट के सभागार में प्रशिक्षण देकर महिलाओं और उनके परिवार को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। अब तो यहाँ एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र भी है, जहाँ नियमित चिकित्सा शिविर और शासकीय चिकित्सा योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। बच्चों की शिक्षा के लिए निकटतम स्कूल से संबद्धता की गई है। शीघ्र ही परिसर में ही एक प्राइमरी स्कूल खोलने की योजना है। रतलाम का यह अहिंसाग्राम पूरे देश में एक अनूठा प्रयोग है। यहाँ संस्कार भी सिखाए जाते हैं। योग- प्राणायाम सिखाने के लिए एक योग शिक्षक नियमित आते हैं।”
“वो जो लोगों को नि:शुल्क आवास दिए, उनका खर्च किसने उठाया ?” पोते ने पूछा।
” बेटा! जब लोग देखते हैं ना कि कोई व्यक्ति अपने बलबूते अच्छी नीयत से काम कर रहा है, तो समाज के लोग भी धन से सहायता करते हैं। स्लम एरिया की महिलाओं ने श्रमदान किया। कुछ औरतें मिलकर सभागार में ही सबके लिए खाना बनाती थीं, ताकि श्रमदान में लगे लोग एकसाथ भोजन कर सकें।अब तो सब अपने-अपने घर में बनाते हैं। अब आदमी बाहर कमाने जाते हैं और औरतें घर में ही काम करके हर महीने अच्छा कमा लेती हैं। आदमियों और बच्चों के जाने के बाद सभागार में ही बैठकर दिन में गीत गाते-गाते काम भी करती रहती हैं। खुशी-खुशी दिन कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं लगता। बच्चे भी पढ़-लिखकर कमाने लगेंगे। सबसे बड़ी बात, कि योग के कारण और माँस-मदिरा छोड़ने से उन सबकी ज़िंदगी बहुत अच्छी हो गई है। सब संस्कारवान हो गए हैं।” दादी ने बताया।
“दादी! हमसे तो ये लोग ज्यादा अच्छे हैं। रोज आपस में मिलते हैं।अब हमारी काॅलोनी में ही देखो ना, सब घर में घुसे रहते हैं या टी.वी. या मोबाइल पर मस्त। वो तो अच्छा है, कि सप्ताह में एक बार कीर्तन के बहाने सब इकट्ठे हो जाते हैं। वैसे मैं भी सोच रहा हूँ, कि खूब कमाकर समाज के लिए कोई ऐसा ही काम करूँगा।”
“मेरा प्यारा राजदुलारा पोता।” कहकर दादी ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।