सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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बेगुनाह चीखें जब गूँज उठी,
परतें-दर-परतें उधड़ गई
नरभक्षियों की ‘एपस्टीन फाइल्स’,
कालिख बन जग में पसर गई।
ये वीभत्स तमाशा कहाँ हुआ ?
शीशे-सा कानों में उतर गया
धरती सुन जैसे चटक गई,
मन पीड़ा से शर्मसार हुआ।
कई चेहरों से नक़ाब उड़े,
काले मुखड़े एकसाथ दिखे
जो लगते थे प्रेरक सबको,
वो गंदी नाली के कीट लगे।
भोगों ने मानव को कैसा,
हैवान बनाकर छोड़ दिया
नन्हें बच्चों को पैर तले,
जल्लादों ने क्यूं कर रौंद दिया।
कानून दौलत तले दबा,
एक द्वीप में ज़ुल्मी-नगर बसा।
ब्रह्माण्ड में चींखें जिनकी गूँजी,
बन श्राप अवश्य लेगा बदला॥