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ऐसा था गुरु-शिष्य सम्बन्ध

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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मेरे भाग्य विधाता (शिक्षक दिवस विशेष )…

पांच सितम्बर का दिन 
दिन है आज महान,
आज मिलता है देश में
गुरूओं को सम्मान।

जो गुरु होते,
सच्चे अर्थों में
वे होते हैं महान,
उनके बल से बनते 
हैं सब बच्चे महान।

देश के कर्णधारों को,
मांज-मांज कर कुन्दन-सा
चमकाते हैं
जिससे बनते हैं वे बच्चे 
एक दिन महान सच्चे।

एक से एक महान गुरु,
थे कभी जग में
गुरु अपने शिष्यों पर 
अपनी जान छिड़कते,
शिष्य भी अपने गुरूओं पर 
ऐसा था मेरे पूर्वजों का,
गुरु-शिष्य सम्बन्ध।

वशिष्ठ मुनि को किसने नहीं जाना,
जिनके सरंक्षण में रह कर 
राम को ईश्वर का रूप मिला,
लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न को
कुन्दन-सा चमका कर,
भातृ-प्रेम का गौरव पूर्ण 
सम्मान दिलाया।

धौमय मुनि को किसने नहीं जाना,
गुरु धौमय मुनि और शिष्य आरूणि
का सम्बन्ध जग ने जाना
गुरु के एक-एक शब्द को,
बडे विश्वास और आदर के साथ
आत्मसात कर शिष्य आरूणि,
आज भी अपना नाम
रौशन करते जग में।

गुरु चाणक्य को किसने नहीं जाना,
पूरी सत्ता ही बदल डाली
आज देश को सख्त जरूरत है,
ऐसे ही गुरुओं की।
देश के हैं ये गौरव,
भारत के सच्चे प्रहरी हैं॥