डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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रक्षाबंधन की सुबह थी। आँगन में तुलसी के पास दीपक जल रहा था। सिया ने थाली सजाई—रोली, अक्षत, दीप और वर्षों पुरानी वह राखी, जिसे उसने इस बार बहुत सँभालकर रखा था।
उसका छोटा भाई मोहन शहर में दिहाड़ी मजदूरी करता था। पिता के निधन के बाद घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ गई थी। सिया की शादी हो चुकी थी, फिर भी वह मायके की चिंता से कभी अलग नहीं हुई।
पिछले वर्ष मोहन की बेटी गंभीर रूप से बीमार पड़ी। इलाज के लिए बड़ी रकम चाहिए थी। मोहन ने गाँव-गाँव मजदूरी की, उधार माँगा, पर रकम पूरी न हुई। तभी सिया ने अपनी शादी में मिली एकमात्र सोने की चूड़ी बेच दी थी।
मोहन ने बहुत रोका था—“दीदी, यह तुम्हारी आखिरी निशानी है।”
सिया मुस्कराई थी—“निशानी गहने नहीं होते भैया, रिश्ते होते हैं।”
आज वही मोहन राखी बँधवाने आया। जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकालकर उसने सिया के सामने रख दिया।
“दीदी, तुम्हारा कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”
सिया ने डिब्बा खोलना चाहा, मगर मोहन ने हाथ रोक लिया।
“इसमें तुम्हारी चूड़ी नहीं है। वह तो लौटाई नहीं जा सकती। उसमें मेरी बेटी की पहली कमाई से खरीदी गई एक छोटी-सी चाँदी की चूड़ी है।” उसने कहा—‘बुआ ने मुझे बचाया था, अब मैं बुआ का मान बचाऊँगी।’
सिया की आँखें भर आईं।
“भैया, राखी का कर्ज़ कभी चुकाया जाता है क्या ?”
मोहन ने धीमे से कहा, “नहीं दीदी, उसे निभाया जाता है।”
सिया ने उसके हाथ पर राखी बाँधी। मोहन ने बहन के चरण छुए।
उस दिन दोनों समझ गए कि राखी केवल रक्षा का वचन नहीं, त्याग, विश्वास और आत्मीयता की वह डोर है, जिसका मूल्य धन से नहीं, जीवन भर के साथ से चुकाया जाता है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥