सरोज प्रजापति ‘सरोज’
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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अतिवृष्टि, हिमअंचल ढह रहे,
क्या बयां करें, सब धुआं-धुआं हो रहे
हिमनद मौन नहीं, तांडव ढा रहे,
पिघल भयावह, दैत्य रूप धरे।
पर्वत चट, सीना चीर दिखा रहे,
सुनो हे मद स्वावलंबी मानव
हस्तक्षेप, विधना क्यों कर रहे ?
सीना छलनी कर, सिर धुन रहे।
निर्लज्ज इंसान, हेय करणी कर रहे,
फटती धरती जीवन निगल रही
दोषी-निर्दोष समभाव, ढेर ढही,
खाक में मिला अन्तर्द्वन्द करे।
प्रकृति के अंचल स्थित,
ये नदियाँ, पहाड़, हिम सर्वत्र
विकास होड़ अंधी, प्रकृति स्थित,
विनाश लीला, काली सर्वत्र।
संजीवनी वारिद क्रुद्ध दृष्टि बहे,
आषाढ़ सावन, भादो मौन घिरे
काली घटा फुंकार दामिनि जला रही,
मानव चीत्कार, अन्तर्मन भेद रही।
शीतल शान्त रागिनी नदियाँ,
तीर्थस्थल, पथ तटिनी, हवेलियाँ
देवस्थल पिकनिक स्पॉट बने,
नतीजतन, प्रलय तांडव दिखे।
क्षण ज़मींदोज़, संभल न पाए,
क्षमा करो कैसा काल-वेग लाए
तुच्छ, कर्म मटियामेट हो रहे,
आह! कर्मों का फल भोग रहे।
संभल मानव हर चीख सन्देश,
त्याग स्वार्थ, मनमानी-द्वेष।
अप्रत्याशित रूप विध्वंस,
निज कर्म इंसान, भोक्ता बने॥
परिचय-सरोज कुमारी लेखन संसार में सरोज प्रजापति ‘सरोज’ नाम से जानी जाती हैं। २० सितम्बर (१९८०) को हिमाचल प्रदेश में जन्मीं और वर्तमान में स्थाई निवास जिला मण्डी (हिमाचल प्रदेश) है। इनको हिन्दी भाषा का ज्ञान है। लेखन विधा-पद्य-गद्य है। परास्नातक तक शिक्षित व नौकरी करती हैं। ‘सरोज’ के पसंदीदा हिन्दी लेखक- मैथिली शरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा हैं। जीवन लक्ष्य-लेखन ही है।
