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किसान की पीड़ा

दिनेश कुमार प्रजापत ‘तूफानी’
दौसा(राजस्थान)
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मैने सींचा लहू पसीना,
अर्पण किया सारा जीवन।
तन-मन सब कुछ त्यागा मैंने,
तब मिला है तुम्हें संजीवन॥

तपती धरा तपता आसमां,
कठिन परिश्रम मैं करता।
तभी भूख से व्याकुल मानव,
अपना पुष्पपथ है भरता॥

हम तो विज्ञापन हैं सत्ता के,
हर बार दिखाए जाते।
हम जीते रहे गरीबी में,
और नेता सत्ता पाते॥

आते ही सत्ता,भूल जाते,
ये खादी टोपी वाले।
मलहम लगाने का इन्तजार,
हाथों में पाये छाले॥

उम्मीदों पर फिर गया पानी,
मिल रही हमको निराशा।
अमीरों की कोठियाँ भरने,
समझा है हमें धनाशा॥

अब तो समझो मेरी पीड़ा,
सज्जनों मत रहो तुम मौन।
पहचानो मुझको भी अब तुम,
आखिर मैं हूँ यारों कौन ?