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कैसा खेल कान्हा…!

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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रोज सुबह आना,शाम ढले जाना,
कैसा खेल कान्हा,ये कैसा खेल कान्हा।

तेरी मधुर मुस्कान,जीना हमें सिखाये,
भोली तेरी सूरत,प्रभु छवि दिखलायें
जो तुम नहीं आते,दिल डूब-डूब जाता,
आँखों से आँसूओं का,बाँध फूट जाता
अपना ही मन हमसे,हो जाता बेगाना,
कैसा खेल कान्हा,ये कैसा खेल कान्हा…।

बंसी की धुन तुम्हारी,होश उड़ा देती,
मीठी-मीठी बतियाँ,प्यार जगा देती
तू छा गया है मन में,मेघ यूँ सावन में,
लगता नहीं जियरा,घर खेत आँगन में
तू नंद है यशोदा का,या कोई फ़साना,
कैसा खेल कान्हा,ये कैसा खेल कान्हा…।

गोकुल की गली-गली,गीत तेरे गाती,
नाम तेरा ले लेकर,राधिका शरमाती
राधा में तेरी छवि,इस तरह समाई,
बीच सबके रहके भी,लगती वो पराई।
मथुरा वृंदावन तेरा,बन गया दीवाना,
कैसा खेल कान्हा,ये कैसा खेल कान्हा…॥

परिचय– डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी ने एम.एस-सी. सहित डी.एस-सी. एवं पी-एच.डी. की उपाधि हासिल की है। आपकी जन्म तारीख २५ अक्टूबर १९५८ है। अनेक वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित डॉ. बाजपेयी का स्थाई बसेरा जबलपुर (मप्र) में बसेरा है। आपको हिंदी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। इनका कार्यक्षेत्र-शासकीय विज्ञान महाविद्यालय (जबलपुर) में नौकरी (प्राध्यापक) है। इनकी लेखन विधा-काव्य और आलेख है।

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