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चली मेहंदी लगाने

श्रीमती देवंती देवी
धनबाद (झारखंड)
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सखी मैं तो चली मेहन्दी लगाने, जूड़ा बनाने,
हाथों में कंगना, कजरा लगाने गजरा सजाने।

सुनो सखी मैं जा रही हूँ, सोलह सिंगार करने,
उम्र ढली तो क्या हुआ, चली मैं पिया को दिखाने।

देख सखी में बन गई हूँ, गगन की सुन्दर सी परी,
मेरे सजना कहते हैं लग रहा है तुम स्वर्ग से उतरी।

सुनो सखी बहुत सुन्दर, मन के भोले हैं मेरे सनम,
तुझे यकीन नहीं हो तो, मैं अभी खाती हूँ कसम।

जब से लाए हैं मुझे ब्याह कर, एक ही समान है प्यार,
हरेक क्षण एक-दूजे से मिलने को दिल होता बेकरार।

मैं सच कहती हूँ जब तक नहीं खाती-वो नहीं खाता है,
सही बताओ सखी, क्या प्यार इसको कहा जाता है।

सौभाग्य दिन २७ मई आते रहना, ये खुशी का दिन है,
है देवन्ती की सालगिरह, यही बस मेरा जीवन है॥

परिचय– श्रीमती देवंती देवी का ताल्लुक वर्तमान में स्थाई रुप से झारखण्ड से है,पर जन्म बिहार राज्य में हुआ है। २ अक्टूबर को संसार में आई धनबाद वासी श्रीमती देवंती देवी को हिन्दी-भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। मैट्रिक तक शिक्षित होकर सामाजिक कार्यों में सतत सक्रिय हैं। आपने अनेक गाँवों में जाकर महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है। दहेज प्रथा रोकने के लिए उसके विरोध में जनसंपर्क करते हुए बहुत जगह प्रौढ़ शिक्षा दी। अनेक महिलाओं को शिक्षित कर चुकी देवंती देवी को कविता,दोहा लिखना अति प्रिय है,तो गीत गाना भी अति प्रिय है |

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