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चुभन पहचान लेना तुम

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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(रचना शिल्प:अरकान-१२२ १२२२ १२२२ १२२२)

सदा रहती नहीं है ये जवानी मान लेना तुम।
नहीं सब व्यर्थ हो जाये समझ इंसान लेना तुम।

ख़ुदा के पास जाना है करम कुछ हो तेरा ऐसा,
हकीकत में यहाँ भगवान को अब जान लेना तुम।

ज़रा-सी जिंदगानी है गुमां करना नहीं यारा,
जवानी भी नहीं अपनी,इसे अब ठान लेना तुम।

सदा चलना सम्हल के यार फैलें ख़ार राहों में,
कहीं छाले न पड़ जाये चुभन पहचान लेना तुम।

बहारें जिंदगी ‘बोधन’ हसीं बन आ ही जाती है,
चमन में फूल खिलते हैं ज़रा संज्ञान लेना तुम॥

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