डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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मन में दीप जलाए शंकर तम से प्रतिदिन लड़ते जाते,
आशा नवसुर शब्द सजाकर, शंकर राहें गढ़ते जाते।
मौन की कोख में पलती है अनकही अन्तर्मन अनुभूति-
सपनों को सच करने तत्पर, पौरुष पग-पग बढ़ते जाते॥
शब्दों की शुचि गंगाजल में हिय भाव कमल खिलते जाएँ,
संवेदित अंतस से गीतों मधुरिम छन्दों ढलते जाएँ।
अदृश्य शक्ति स्पर्श सहेजे, आत्मा का सूक्ष्म स्पन्दन-
क्षण-क्षण नव आलोकित सत्पथ, ख़ुद सँभल पथिक बढ़ते जाएँ॥
इतिहास की स्वर्णिम दिल धड़कन से, नया साहस संयम रचते हैं,
संघर्षों की ज्वाला में जल, नित संकल्प लक्ष्य फलते हैं।
अंतराग्नि बस मौन अवस्थित, सत्य दीप हिय स्वप्न सँजोए-
सत्यपूत राहों पर चलकर, मानव यथार्थता रचते हैं॥
करुणा की वर्षा से कविता मरुस्थल उर्वर हरित बनाए,
प्रेम की कोमल छाया शीतल क्षमा दया संताप मिटाए।
मौन धरा पर उतर काव्य में मन नाटकीय स्पर्श अनुभूति-
जीवन के सूने पथ पर नव आशा नवदीप जलाए॥
वेदना के सागर से प्रकटित आशा माणिक मोती चुनते,
अँधियारे पथ में भी अरुणिम, रिश्ते विश्वासों से भरते।
मौन क्षितिज पर उगता पादप कामायनी में सुरभित स्वप्न-
मानव को मानवता मोलक शान्ति प्रेम शिखरों तक सुनते॥
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥