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छोटे पर्दे का आम आदमी बड़े पर्दे का कलाकार

डॉ.सोना सिंह 
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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लोकप्रिय सिनेमा के मजबूत स्तंभ………..
भारतीय फिल्म उद्योग का एक ऐसा चेहरा,जो छोटे पर्दे पर तो आम आदमी है,पर वही आम आदमी बड़े पर्दे का बड़ा कलाकार है। थिएटर, टी.वी. और सिनेमा का एक नायक जिसे भारतीय दर्शक आफिस- आफिस के त्रस्त भारतीय आम आदमी की तरह जानते-पहचानते हैं। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त पंकज कपूर को एक डाॅक्टर की मौत और मकबूल दोनों के लिए बहुत लोकप्रियता मिली। लुधियाना में पैदा हुए पंकज कपूर ने इंजीनियर की उपाधि ली,और फिर वे चल पड़े अपने अंदर के कलाकार को खुश करने। दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य संस्थान से नाट्यकला में अध्ययन किया। यहां भी इन्हें श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला। इन्होंने निर्देशक के तौर पर ७४ नाटकों और धारावाहिकों का निर्देशन भी किया। इनमें-मोहनदास बीएएलएलबी,वाह भाई वाह,साहबजी बीबीजी गुलामजी,दृष्टांत, कनक की बाली,अलबर्ट ब्रिज और पचानव सवार आदि थे।


पंकज कपूर समानांतर सिनेमा का एक लोकप्रिय नाम है। इन्होंने १९८२ में श्याम बेनेगल की फिल्म आरोहण से अपनी फिल्मी पारी की शुरूआत की। रिचर्ड एटरबरो की फिल्म गांधी में सचिव प्यारेलाल की भूमिका भी की,फिर बेन किंगस्ले की हिन्दी गांधी में भी भूमिका की। १९८३ में बेनेगल की फिल्म मंडी के साथ इसी साल की लोकप्रिय फिल्म जाने भी दो यारों रही। सामाजिक व्यवस्था और प्रशासन पर कुठाराघात करती दोनों फिल्में भारतीय सिनेमा की हमेशा देखी जाने वाली फिल्में हैं। सईद अख्तर मिर्जा की मोहन जोशी हाजिर हो,मृणाल सेन की कंधार,विधु विनोद चोपड़ा की खामोश भी इसी कतार की फिल्में हैं। कहां-कहां से गुजर गए,जाने भी दो यारों,आधारशिला,मंडी,कंधार, मोहन जोशी हाजिर हो,खामोश,एतबारऔरआघातजैसी कितनी ही फिल्में की।मुसाफिर,जलवा,ये वो मंजिल नहींफिल्में भी इन्होंने की।
१९८६ में
चमेली की शादी,एक रूका हुआ फैसला,१९८७ में ये तो मंजिल तो नहीं, जलवाऔर १९८९ में राख आमिर के साथ की। पंजाबी में माटी दा दिवा तथा १९९२ में मणिरत्नम की रोजा में आलोचकों ने पुरस्कृत किया था। १९९१ में एक डाॅक्टर की मौत को स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार मिला।
टेलीविजन पर १९८६ में करमचंद तथा पल्लवी जोशी के साथ कब तक पुकारूं किया,जो दर्शकों को आज भी याद है। जबान संभाल के,विजया मेहता का लाईफ लाईन,नीम का पेड़ के साथ उनके आफिस-आफिस ने तो धमाल मचा दिया। व्यवस्था पर तंज कसने का एक रोचक तरीका मुसद्दीलाल के रूप में भारतीय दर्शकों से रूबरू हुआ। २००३ में पंकज ने विशाल भारद्वाज की मकबूल में राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल किया। इसी तरह दस,हल्ला बोल,ब्लू अंब्रेला में भी अभिनय किया। लव खिचड़ी,चला मुसद्दी आफिस-आफिस,फाइडिंग फेनी,मटरू की बिजली का मंडोला और टोबा टेक सिंह जैसी फिल्में की,जिनमें इनकी अदाकारी को सभी दर्शकों ने सराहा। मौसम और मोहनदास एलएलबी का निर्देशन भी किया।
पंकज ना सिर्फ बड़े पर्दे पर,बल्कि छोटे पर्दे के भी लोकप्रिय कलाकार है। इन्हें सभी दर्शकों का भरपूर स्नेह मिला और आज भी जारी है। पंकज कपूर एक ऐसा नाम है,जिनके दम पर फिल्मों को पसंद किया जाता रहा है। आज भी इनकी अदाकारी के दीवानों की कमी नहीं है। सिनेमा और टेलीविजन की मुख्यधारा में एक समानांतर धारा खड़ी करने का श्रेय पंकज को जाता है।

परिचय-डॉ.सोना सिंह का बसेरा मध्यप्रदेश के इंदौर में हैl संप्रति से आप देवी अहिल्या विश्वविद्यालय,इन्दौर के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला में व्याख्याता के रूप में कार्यरत हैंl यहां की विभागाध्यक्ष डॉ.सिंह की रचनाओं का इंदौर से दिल्ली तक की पत्रिकाओं एवं दैनिक पत्रों में समय-समय पर आलेख,कविता तथा शोध पत्रों के रूप में प्रकाशन हो चुका है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्दु हरिशचंद्र राष्ट्रीय पुरस्कार से आप सम्मानित (पुस्तक-विकास संचार एवं अवधारणाएँ) हैं। आपने यूनीसेफ के लिए पुस्तक `जिंदगी जिंदाबाद` का सम्पादन भी किया है। व्यवहारिक और प्रायोगिक पत्रकारिता की पक्षधर,शोध निदेशक एवं व्यवहार कुशल डॉ.सिंह के ४० से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन,२०० समीक्षा आलेख तथा ५ पुस्तकों का लेखन-प्रकाशन हुआ है। जीवन की अनुभूतियों सहित प्रेम,सौंदर्य को देखना,उन सभी को पाठकों तक पहुंचाना और अपने स्तर पर साहित्य और भाषा की सेवा करना ही आपकी लेखनी का उद्देश्य है।

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